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Showing posts from June, 2025

योगस्य महत्वम्

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  योगस्य महत्वम्          @मानव योग भारतवर्ष की अति प्राचीन विद्या है  यह ऐसी आध्यात्मिक क्रिया है जो हमारे शरीर,मन एवं आत्मा को परिमार्जित करके हमें ईश्वर सँग जोड़ती है। चित्त में चलने वाली अनंत वृत्तियों,  जन्म-जन्मांतर के मलिन सँस्कारों का निरोध ही योग है।       (महर्षि पतंजलि) मन की नकारात्मक आसुरी वृत्तियाँ ही हमारे जीवन की उन्नति में  सबसे बड़ी बाधक हैं। शरीर एव मन का गहरा संबंध है; मन का जैसा चिंतन होता है,  शरीर भी उसी दिशा में अग्रसर होता है। शारीरिक एवं मानसिक  क्षमताओं में वृद्धि का  आधार योग ही है; योग क्रियाएं शरीर को  परिपुष्टता प्रदान करती हैं।  योग हमारे शरीर को नई  आध्यात्मिक ऊर्जा से  परिपूर्ण करता है; उसे समृद्ध करता है।  जिसने अपने शरीर को योग रूपी अग्नि में तपा लिया है, उसके शरीर से रोग एवं अकाल मृत्यु भी दूर रहती है। वेद रूपी कल्पवृक्ष का फल  योगशास्त्र है; इस योगशास्त्र के सेवन से  सँसार के तीन तापों का भी  शमन होता हैं।   (गोरक्ष सँहिता) नियमित ...

पिता का त्याग

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  पिता का त्याग                 @मानव भारतीय सँस्कृति में पिता को देवतुल्य माना गया है; धरती पर पिता से बढ़कर श्रेष्ठ मार्गदर्शक नहीं है।  पिता का सँघर्ष,अनुभव  और ज्ञान सँतान को कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। परिवार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और स्नेह को पिता शब्दों से नहीं, अपने कार्यों से प्रकट करता है। वह जीवनभर सँघर्ष कर  अपनी सँतान के सुनहरे भविष्य की नींव रखता है। पुत्र कितना भी निर्दयी हो जाए, पिता उसके प्रति ममता और प्रेम को नहीं त्यागता,  क्योंकि उसके लिए पिता ने  कितनी ही विपत्तियाँ झेली हैं।    ( विष्णु पुराण ) पिता के हृदय में पुत्र के लिए सदैव ममता और प्रेम ही अँकुरित होता है; इसीलिए पिता का विराट व्यक्तित्व स्वर्ग से भी ऊँचा माना गया है। पिता में सभी देवताओं का  निवास होता है, इसलिए सँतान को हमेशा  पिता का सम्मान और आदर करना चाहिए। यज्ञोपवीत में से एक धागा  पितृ ऋण का प्रतीक है; यह धागा सँतान को अपने माता-पिता के प्रति  दायित्वों को बोध करा...