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नवरात्र साधना का सँदेश

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  नवरात्र साधना का सँदेश              @मानव भारतीय परंपरा में नवरात्र  आत्मपरिष्कार और साधना का महापर्व है, जो हमें आत्ममंथन करने  और जीवन को  सकारात्मक दिशा देने का  अवसर प्रदान करता है। नवरात्र साधना से मनुष्य के भीतर छिपी दिव्य शक्तियों का जागरण  और नई ऊर्जा तथा सकारात्मकता का  सँचार होता है। इस समय का उपयोग  आत्मानुशासन,साधना  और आत्मविकास हेतु करने से, जीवन संतुलित और उद्देश्यपूर्ण बन सकता है। नवरात्र साधना सँयम,धैर्य,  और सकारात्मक सोच  विकसित करने की प्रेरणा देता है। नवरात्र वह समय है, जब विशेष ऊर्जा का सँचार  प्रकृति में होता है, जो साधक के लिए  अनुकूल वातावरण प्रदान करती है।  नवरात्र साधना  आत्मपरिष्कार के साथ  आत्मिक उन्नति का श्रेष्ठ अवसर है। नवरात्र के नौ दिन  मनुष्य के भीतर छिपी  नकारात्मक प्रवृत्तियों को (जैसे आलस्य,क्रोध,लोभ अहंकार) समाप्त करने के लिए उपयुक्त हैं।  आत्मसाधना,स्वाध्याय  और सेवा के माध्यम से  जीवन को श्रेष्ठ बनाने का पर...

नारी स्वयँ शक्ति है

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  नवरात्र पर नारी स्वयँ शक्ति है        @मानव नवरात्र का हर दिन हमें अपने अँदर की शक्ति को पहचानने का सँकल्प लेने का सँदेश देता है। नवरात्र केवल उत्सव नहीं, आत्मविश्वास, तप की शक्ति और आत्मशक्ति को पहचानने का समय भी है। नवरात्र में हम जिस शक्ति की आराधना करते हैं, वही शक्ति हर महिला के भीतर निवास करती है। जब देवी शैलपुत्री के रूप में आती हैं तो आत्मविश्वास का सँकल्प लेकर आती हैं। जब ब्रह्मचारिणी होती हैं तो धैर्य और तप का सँकल्प लेने के लिए प्रेरित करती हैं। शक्ति व निडरता का प्रतीक माँ चन्द्रघण्टा हैं; इस स्वरूप में वह भय के सामने साहस के साथ खड़े होने का सँदेश देती हैं।  देवी का कूष्माण्डा रूप  सृजन और सकारात्मक  ऊर्जा का प्रतीक है, यह स्वरूप बताता है कि सकारात्मक सोच से नई सँभावनाएं जन्म लेती हैं। स्कन्दमाता ममता,सँरक्षण  और करुणा का प्रतीक हैं;  यह जीवन में प्रेम और जिम्मेदारी के महत्व को दर्शाता है। माँ कात्यायनी की छवि से झलकता आत्मबल का सँकल्प ही, नवरात्र का सबसे बड़ा सँदेश है कि शक्ति बाहर नहीं, हमारे भीतर ही है और यह सिर्फ जगाने...

आत्मपरिष्कार का उत्सव

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  नवसँवत्सर पर, आत्मपरिष्कार का उत्सव                @मानव भारतीय कालगणना का प्रारंभ विधाता की सृष्टि-रचना के प्रथम दिवस से होता है,  सृष्टि का यही प्रथम दिवस  युगादि है। भारतीय ज्योतिष की काल गणना पद्धति में  नव सँवत्सर मात्र तिथियों का परिवर्तन नहीं, अपितु जड़-चेतन,प्रकृति  और साँस्कृतिक मूल्यों के  पुनर्जागरण का महापर्व है। जब प्रकृति पल्लवित पुष्पित हो नूतन श्रृंगार करती है, तब वह हमें भी विचारों में नवीनता लाने का सँदेश देती है। वसँत की मधुमयी प्रकृति,  शीत के कोप से मुक्त होता परिवेश और समृद्ध होती धरती के कारण चैत्र मास 'श्रीमान्' मास है। इस ऋतु में ताप और शीत के मध्य जो 'साम्यता' परिलक्षित होती है, वही हमारे जीवन का  आदर्श बनता है; हमारा व्यवहार प्रेम,त्याग और विवेक के त्रिवेणी सँगम से अभिसिंचित होता है। सँसाधनों का पाशविक दोहन करने के स्थान पर उनका सँरक्षण करना ही  प्रकृति के प्रति हमारी वास्तविक कृतज्ञता है।  अनुशासन का अर्थ केवल समयबद्धता नहीं,  अपितु इंद्रियों पर सँयम  और वाणी...

नई सोच,सशक्त छवि

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  अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर, नई सोच,सशक्त छवि               @मानव करुणा में डूबी नारी अस्मिता को स्वर देते महिला दिवस का अवसर मानवीय साहस और सँवेदनशीलता की  सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में प्रासंगिक है जो स्त्री की अद्वितीय शक्ति का वास्तविक उत्सव है। भारतीय स्त्री धैर्य,निष्ठा,सँकल्प और जीवन को उसकी समस्त जटिलताओं सहित स्वीकार करने की अद्भुत सामर्थ्य से दीप्त है।  यद्यपि वे भाग्य-चक्र, सामाजिक व्यवस्था,  सत्ता-नियंत्रित निर्णयों और पितृसत्तात्मक  मान्यताओं के अन्याय में  निरंतर आहत होती रहीं।  असाधारण स्त्रियों ने  उसकी कीमत मौन वेदना,त्याग और अनकहे संघर्ष से चुकाई, उनके निरन्तर सँघर्ष ने उनकी महिमा गाई गई। पौराणिक स्त्री की अपेक्षा आज की स्त्री जीवन में  नए अर्थ ग्रहण करती है; यदि वही विडंबनाएं,परीक्षाएं आज उनके सामने हों, तो वे अपने अस्तित्व को किस प्रकार पुनर्परिभाषित करेंगी? आज की नायिकाएँ जीवन को अपनी शर्तों पर  पुनः गढ़ती हैं; उनके लिए पौराणिक जीवन स्मरण भर नहीं, प्रेरणा का स्रोत है, जो उन्हें बा...

आन्तरिक चेतना रँगते रङ्ग

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  आन्तरिक चेतना रँगते रङ्ग              @मानव पर्वों की निरंतरता समाज की साँस्कृतिक समृद्धि  और सामूहिक उल्लास का सँकेत मानी जाती है; तभी उत्सवों की भूमि भारत तीज-त्योहारों की पावन धरा है। होली केवल पर्व नहीं,  वरन् भारत की धड़कनों में गूँजता समरसता का सँगीत है; रँगोत्सव रङ्गों का ऐसा सँवाद है,  जिसमें अतीत की राख से  भविष्य के रङ्ग जन्म लेते हैं।  रँगोत्सव के दिन जब रङ्ग चेहरे पर लगते हैं, तब असर मन पर होता है, उस क्षण ऊँच-नीच का अथवा अमीर-गरीब का कोई प्रश्न नहीं रह जाता है। रङ्ग सबको एक-सा बना देते हैं- एक ही हँसी, एक ही उमंग, एक ही स्पर्श। यह बताता है कि विविधता  विरोध नहीं,सौंदर्य है; तभी विभिन्न समुदाय मिलकर राष्ट्र की आत्मा को पूर्ण बनाते हैं। यहाँ स्त्री उत्सव की केंद्र बिंदु है, उसकी सक्रियता शक्ति और स्नेह के सुंदर सँतुलन का प्रतीक है। यह एक ऐसा सँतुलन है,  जिसमें हास्य भी है, सम्मान भी और अपनापन भी। रूठना-मनाना भी प्रेम का ही एक रङ्ग है; इस पर्व की शक्ति यही है  कि यह सामाजिक दीवारों को नरम कर देता...

शिवत्व की अनुभूति

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  शिवरात्रि पर्व पर, शिवत्व की अनुभूति              @मानव जीवन में शिवत्व की  अनुभूति का पर्व है महाशिवरात्रि! शिव और शक्ति के मिलन का दिव्य उत्सव है यह पर्व! जो पुरुष और स्त्री ऊर्जा चेतना और सृजनात्मक शक्ति के मिलन के प्रतीक का अवसर है। शिव का अर्थ मङ्गलकारी  और अतिशय कल्याणकारी है; इसलिए शिवत्व का मार्ग  आत्म-कल्याण का मार्ग है।  आध्यात्मिक साधक योगी  और उपासक समस्त सृष्टि का स्रोत इसी पर्व को मानते हैं। भगवान शिव आदियोगी हैं;  शिवरात्रि का यह अवसर  आँतरिक योग साधना उपासकों के लिए विशेष लाभकारी है। सृष्टि के कण-कण में विद्यमान शिव तत्व की अनुभूति हेतु  साधकों के लिए यह रात्रि  अंतस को ध्यान की अवस्था में केंद्रित करने का दिव्य अवसर है। यह भगवान शिव के  त्यागमय,ज्ञान,वैराग्य,  करुणा से परिपूर्ण  साधनानिष्ठ जीवन के  आत्म-कल्याणकारी आदर्श का अनुकरण करने का पर्व है।  इस अवसर की समस्त धार्मिक क्रियाओं एवं उत्सवों में आँतरिक उत्थान एवं प्रकृति के प्रत्येक तत्व के कल्याण का सँदेश नि...

आत्मकल्याण पथ प्रदर्शक

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  स्वामी दयानंद जन्मजयंती आत्मकल्याण पथ प्रदर्शक              @मानव वेदों की भाषा में मनुष्य का अँतिम लक्ष्य  मोक्ष निर्धारित करने वाले स्वामी दयानंद जी ने वेदों की ओर लौटने के लिए  लोगों का आह्वान किया। इसका अभिप्राय भारत की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ जाना है; ब्रह्मविद्या प्राप्ति के लिए  स्वयं को प्रस्तुत करना है; क्योंकि ब्रह्म विद्या ही व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाती है। अतः "उठो, जागो और तब तक रुको नहीं  जब तक कि लक्ष्य की  प्राप्ति न हो जाए।" "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधयत"       (कठोपनिषद) उनका श्रेय वाक्य रहा। ब्रह्म की रहस्य भरी विद्या के विवेचन से परिपूर्ण  उपनिषदों के साथ तादात्म्य से हमें विवेक और वैराग्य की  ओर ले जाती है। उपनिषद जीवन का  वास्तविक रहस्य अपने आप को जानना है;  जिसे जानकर ही अपने लक्ष्य की ओर गति करना है और जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो, तब तक निरंतर आगे बढ़ते रहना है। यमराज ने नचिकेता को  मनुष्य जीवन के दो मार्गों  श्रेय और प्रेय मार्ग का बोध कराय...