आत्मपरिष्कार का उत्सव
नवसँवत्सर पर, आत्मपरिष्कार का उत्सव @मानव भारतीय कालगणना का प्रारंभ विधाता की सृष्टि-रचना के प्रथम दिवस से होता है, सृष्टि का यही प्रथम दिवस युगादि है। भारतीय ज्योतिष की काल गणना पद्धति में नव सँवत्सर मात्र तिथियों का परिवर्तन नहीं, अपितु जड़-चेतन,प्रकृति और साँस्कृतिक मूल्यों के पुनर्जागरण का महापर्व है। जब प्रकृति पल्लवित पुष्पित हो नूतन श्रृंगार करती है, तब वह हमें भी विचारों में नवीनता लाने का सँदेश देती है। वसँत की मधुमयी प्रकृति, शीत के कोप से मुक्त होता परिवेश और समृद्ध होती धरती के कारण चैत्र मास 'श्रीमान्' मास है। इस ऋतु में ताप और शीत के मध्य जो 'साम्यता' परिलक्षित होती है, वही हमारे जीवन का आदर्श बनता है; हमारा व्यवहार प्रेम,त्याग और विवेक के त्रिवेणी सँगम से अभिसिंचित होता है। सँसाधनों का पाशविक दोहन करने के स्थान पर उनका सँरक्षण करना ही प्रकृति के प्रति हमारी वास्तविक कृतज्ञता है। अनुशासन का अर्थ केवल समयबद्धता नहीं, अपितु इंद्रियों पर सँयम और वाणी...