Posts

राखी की डोर

Image
  राखी की डोर           @मानव बारिश की बूँदों की  रुनझुन के बीच आता है रक्षाबंधन! साधारण से राखी के धागे में भाई-बहन के प्रेम,विश्वास  और भावनाओं की पूरी दुनिया समाई होती है। रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रति प्रेम,विश्वास और दायित्व का बंधन है; राखी का सूत्र होने से पहले, यह आत्माओं के बीच  एक स्नेहसिक्त बंधन का  पावन प्रतीक है। आधुनिकता की आँधी के बावजूद कम नहीं हुआ है  भाई-बहन के बीच स्नेह! एक ऐसा रिश्ता जिसकी घनी छाँव में सदा बैठा होता है बचपन! समय बदलता है, दायित्व बढ़ते हैं, परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन बचपन का अपनत्व सदा रहता है। किसी रीति-रिवाज के कारण हमारे सँबंध नहीं, बल्कि एक-दूसरे को आवश्यक समय,ध्यान और ऊर्जा देने से प्रगाढ़ बनते हैं। इसलिए राखी केवल त्योहार नहीं, बल्कि पुरानी स्मृतियों को  फिर से जी लेने का  अवसर भी है। यहाँ रक्षा का अर्थ केवल शरीर की रक्षा ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान, सपनों,आत्मविश्वास और गरिमा की रक्षा करना भी है। हमें केवल शरीर की नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान, सपनों,आत्मविश्वास और गरिम...

सँस्कृत दिवस

Image
  श्रावण पूर्णिमा सँस्कृत दिवस (भारतीय भाषाओं की जननी)           @मानव भारतीय भाषाओं की जननी और ज्ञान की भाषा  जिसकी परंपरा किसी एक धर्म,सँप्रदाय  या देवता तक सीमित नहीं, जो सँपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की  ज्ञान-परंपरा की सँवाहक रही, सहस्त्राब्दियों से जिसमें ज्ञान का सृजन,परिष्कार,सँरक्षण और प्रसार होता आया है वह सँस्कृत है।  इसके वेदों में ऋग्वेद प्रकृति, अथर्ववेद औषधि, यजुर्वेद कर्मकाण्ड और सामवेद स्वर-सँगीत से जुड़े ज्ञान को सामने लाते हैं।  उपनिषदों में ब्रह्म और आत्मा सँबंधी चिंतन तक  इसकी परंपरा निरंतर  विस्तृत होती दिखाई देती है। सँस्कृत में विकसित  साँख्य,योग,न्याय,  वैशेषिक,मीमाँसा और वेदांत जैसे षड्दर्शनों का  मूल उद्देश्य मनुष्य को  मोक्ष की ओर ले जाना है।  महाकाव्य काल में  रामायण,महाभारत ने  धर्म,नीति,कर्म और आत्मबोध को जीवन से जोड़ा। पुराणों ने जनसाधारण की धार्मिक जीवन को दिशा दी, खगोल,भूगोल,इतिहास,  समाज का ज्ञान  जनसुलभ बनाया; नीति-शास्त्रों ने नैतिक आचरण की...

आया सावन

Image
  आया सावन        @मानव सावन का आगमन  केवल ऋतु-परिवर्तन नहीं, अपितु भारतीय आत्मा के  पुनर्जागरण का उत्सव है।  वर्षा की प्रथम बूँद जैसे तप्त धरती को  शीतलता प्रदान करती है,  वैसे ही सावन का प्रत्येक दिन भक्त-हृदय को शिवमय कर देता है। सावन को आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और जीवन को  आध्यात्मिक दिशा देने का  श्रेष्ठ अवसर भी माना जाता है। श्रावण केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को सात्विकता, सकारात्मकता और ईश्वर के प्रति समर्पण का सँदेश देने वाला पवित्र काल है। सावन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का नहीं, बल्कि त्याग,करुणा,सँयम  और आत्ममंथन के माध्यम से जीवन को बेहतर बनाने का भी सँदेश देता है। भारतीय सँस्कति में सावन प्रकृति सँरक्षण और लोकमंगल की साधना का पवित्र महीना माना गया है। श्रावण मास भारतीय सँस्कृति के शाश्वत मूल्यों को स्मरण कराने वाला है। सावन हमें बाह्य उपलब्धियों से अधिक आँतरिक उपलब्धियों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है।   ✍️मनोज श्रीवास्तव

विवेकी सन्त दृष्टि

Image
  तुलसी जयंती विवेकी सन्त दृष्टि              @मानव 'गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा' इसके अनुसार तुलसी  भगवान के ऐसे भक्त हैं, जो संसार को पार उतारने वाला ग्रंथ  'श्रीरामचरितमानस' देते हैं। तुलसी की दृष्टि है कि 'कोई ऐसा गुण नहीं है, जो हमारे प्रभु श्रीरामचंद्र जी में न हो और कोई ऐसा दोष नहीं है, जो मुझ तुलसीदास में न हो।' श्रीरामचरितमानस का  यही जीवन दर्शन है। सबको राममय मानकर  प्रणाम करना और फिर सत को स्वीकार कर असत का त्याग करना ही तुलसी के मानस की दृष्टि है। इस दृष्टि ने श्रीरामचरित्र का  ऐसा सेतु बनाया, जिस पर चढ़कर समर्थ और बड़े लोगों के साथ अत्यंत छोटी चींटी,  जिसमें कोई सामर्थ्य है ही नहीं, वह भी पार जा सकती है; लोक और वेद के बीच  यह सेतु बना है।   ✍️मनोज श्रीवास्तव

विषपायी

Image
  विषपायी         @मानव समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भयाक्रांत सृष्टि की रक्षणार्थ  स्वयं कण्ठ में धारण करने का प्रसंग  हमें बताता है कि शिवत्व का वास्तविक अर्थ केवल भगवान शिव की  पूजा करना नहीं, बल्कि दूसरों के दुख को  कम करने, समाज के कल्याण और धर्म की रक्षा के लिए  त्याग,सेवा और लोककल्याण की भावना धारण करना है। तभी तो हलाहल पान करके  शिव ने हमें सिखाया है परम् त्याग! अमृत का पान सभी चाहते हैं, लेकिन जनकल्याण के लिए भगवान विष पीते हैं; यही कारण है कि शिव की पूजा  देव, दैत्य व मनुष्य तीनों करते हैं।   ✒️मनोज श्रीवास्तव

स्वयँ का अनुशासन है स्वाधीनता

Image
  स्वयँ का अनुशासन है स्वाधीनता                @मानव स्वाधीनता का सच्चा अर्थ  स्वयं के अधीन यानी अपने अनुशासन  और व्यवस्था में जीना है।  स्वतँत्रता केवल अधिकारों का उपयोग करना नहीं है,  बल्कि अधिकारों के साथ  अपने कर्तव्यों का पालन करना भी है। स्वाधीनता में सबसे महत्वपूर्ण स्वयं का अनुशासन है, स्वतँत्रता का अर्थ है स्वयं के तंत्र में रहना, न कि किसी बाहरी या विकृत व्यवस्था के  अधीन होना। अपने तँत्र में रहना तभी सार्थक है, जब हमें अपने कर्तव्यों का बोध भी हो। नागरिक कर्तव्यों का  पालन करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना नागरिक अधिकारों को जानना और माँगना। जिसने कभी परतँत्रता का  कष्ट झेला हो, वही स्वाधीनता की  असली कीमत और उसकी पवित्रता को  गहराई से अनुभव कर सकता है। पराधीन व्यक्ति कभी भी  सुख का अनुभव नहीं कर सकता है, पराधीनता एक तरह का  अभिशाप होती है। मानव ही नहीं, पशु-पक्षी भी पराधीनता में सुखी नहीं रह पाते, पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।  ( श्रीरामचरितमानस   बालकाण्ड) व्यक्ति क...

शिवोऽहम्

Image
  शिवोऽहम्            @ मानव जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था, दिन था न रात्रि, सत था न असत, तब केवल निर्विकार शिव ही थे। शिव आदि देव हैं; शिव महादेव हैं; ऋग्वेद में भगवान शिव को रुद्र कहा गया है; पुराणों में वे महादेव के रूप में स्वीकार्य हैं। शिव ही दाता हैं और भोक्ता भी शिव ही हैं; शिव का अर्थ है आनंद, परम मंगल और परम कल्याण। ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं  विष्णु पालक हैं और शिव सँहारक हैं पर मूलरूप से शक्ति एक ही है, जो तीन अलग-अलग रूपों में अलग-अलग कार्य करती है। वह मूल शक्ति शिव ही हैं। ब्रह्मा,विष्णु व शंकर की उत्पत्ति माहेश्वर अँश से ही होती है।     (स्कंद पुराण) सृष्टि का आदि कारण शिव ही हैं, इस ब्रह्माण्ड व्यवस्था में  परमात्मा के पारमार्थिक  आनंदमय स्वरूप को  प्रकट करने वाली शक्ति को हम विद्या व अविद्या कह सकते हैं। सृष्टि का अनादि तत्व शिव ही हैं; वही कारण हैं सृष्टि,स्थिति और प्रलय का; उन्हीं शिव का स्वरूप  ज्योतिर्लिंग के रूप में है।  इस ज्योतिर्लिंग में ही  सब-कुछ समाहित है; शिवलिङ्ग की जलहरी...