आस्था का अक्षय वट
वट सावित्री अ मावस्या आस्था का अक्षय वट @मानव भारत की पावन धरा पर प्रकृति का कण-कण पूजनीय है, लेकिन वटवृक्ष का स्थान सर्वोपरि और विशिष्ट है। बरगद को अक्षय वट इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसका कभी विनाश नहीं होता। मान्यता है कि प्रलय काल में भी जब पूरी सृष्टि जलमग्न होती है, तब भगवान विष्णु इसी वृक्ष के पत्ते पर बाल रूप में दर्शन देते हैं। धार्मिक मान्यतानुसार वट की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। भगवान शिव को दक्षिणामूर्ति रूप में एक वटवृक्ष के नीचे बैठे दिखाया जाता है, जहाँ वे मौन रहकर ऋषियों को परम ज्ञान देते हैं। सनातन सँस्कृति में वट सावित्री का पर्व बरगद की इसी महत्ता का सबसे बड़ा उत्सव है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को जब सुहागिन स्त्रियाँ बरगद के चहुँओर कच्चा सूत लपेटकर परिक्रमा करती हैं, तो वे उस अक्षय शक्ति को नमन करती हैं, जो सदियों से जीवन को सींच रही है। पौराणिक कथानुसार, पतिव्रता सावित्री ने इसी वृक्ष की छाया में बैठकर अपने पति सत्यवान के प्राण...