आन्तरिक चेतना रँगते रङ्ग
आन्तरिक चेतना रँगते रङ्ग @मानव पर्वों की निरंतरता समाज की साँस्कृतिक समृद्धि और सामूहिक उल्लास का सँकेत मानी जाती है; तभी उत्सवों की भूमि भारत तीज-त्योहारों की पावन धरा है। होली केवल पर्व नहीं, वरन् भारत की धड़कनों में गूँजता समरसता का सँगीत है; रँगोत्सव रङ्गों का ऐसा सँवाद है, जिसमें अतीत की राख से भविष्य के रङ्ग जन्म लेते हैं। रँगोत्सव के दिन जब रङ्ग चेहरे पर लगते हैं, तब असर मन पर होता है, उस क्षण ऊँच-नीच का अथवा अमीर-गरीब का कोई प्रश्न नहीं रह जाता है। रङ्ग सबको एक-सा बना देते हैं- एक ही हँसी, एक ही उमंग, एक ही स्पर्श। यह बताता है कि विविधता विरोध नहीं,सौंदर्य है; तभी विभिन्न समुदाय मिलकर राष्ट्र की आत्मा को पूर्ण बनाते हैं। यहाँ स्त्री उत्सव की केंद्र बिंदु है, उसकी सक्रियता शक्ति और स्नेह के सुंदर सँतुलन का प्रतीक है। यह एक ऐसा सँतुलन है, जिसमें हास्य भी है, सम्मान भी और अपनापन भी। रूठना-मनाना भी प्रेम का ही एक रङ्ग है; इस पर्व की शक्ति यही है कि यह सामाजिक दीवारों को नरम कर देता...