सद्ज्ञान दाता
नारद जयन्ती पर, सद्ज्ञान दाता @मानव विश्वकल्याण को चिंतन के केंद्र में रखती है भारतीय ऋषि-परंपरा! विश्व को ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति मानने से यह भाव सुसंगत एवं पुष्ट होता है। चारों युगों के काल-प्रवाह में हमारी ऋषि-परंपरा सबके माँगल्य की प्रार्थना करती है। ज्ञान-भक्ति एवं वैराग्य के मूर्तिमान स्वरूप श्रीनारद जी को सँपूर्ण आर्ष वाङ्गमय में विशेष महत्व प्राप्त है। उनके स्वरूप का निरूपण नाम के आधार पर किया गया है अबोध जनों को ज्ञान देने वाले और स्वयं सर्वथा बालकवत निरभिमान रहने वाले, अनेक जन्मों का स्मरण रखने वाले परम ज्ञानी होने से ये नारद कहलाते हैं। ददाति नारं ज्ञानं च बालकेभ्यश्च बालकः। जातिस्मरो महाज्ञानी तेनेयं नारदाभिधः।। ‘नार’ का अर्थ है ज्ञान, सबको ज्ञान का प्रसाद बांटने से नारद कहलाए, ऐसा भी कहा जाता है। लोकपितामह ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले श्रीनारद जी वस्तुतः भगवान की मंगलमयी विभूति ही हैं, जो जगत्कल्याण हेतु समस...