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वेदस्वरूप श्रीजगन्नाथ

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  रथयात्रा पर, वेदस्वरूप श्रीजगन्नाथ             @मानव विष्णुभक्त इंद्रद्युम्न ने  साकार विष्णुपूजन हेतु  चतुर्धामूर्तियों को स्थापित किया तब से श्रीजगन्नाथ जी की  रथयात्रा चल रही है। श्रीजगन्नाथ जी सँपूर्ण वेदों का स्वरूप हैं  और उनकी रथयात्रा  वैदिक संस्कृति का जयघोष है।  जगत अर्थात शरीर, जो क्षयशील है, नाथ अर्थात शरीर स्थित अक्षय आत्मा; जगत में दृश्यमान प्रत्येक जीव जगन्नाथ का स्वरूप है। जगत अर्थात दृश्यमान प्रकृति; नाथ अर्थात प्रकृति को  आलोक प्रदान करने वाले  सूर्य नारायण। जीव और ब्रह्म एक हैं,  यह वैदिक सिद्धांत है; माया द्वारा जीव अलग प्रतीत होते हुए भी  ब्रह्म ही हैं। जगन्नाथ वासुदेव (परमात्मा) हैं, बलभद्र संकर्षण (जीव),  सुभद्रा प्रद्युम्न (मन) तथा सुदर्शन अनिरुद्ध (अहंकार) हैं।  श्रीजगन्नाथ परब्रह्म परमात्मा, श्रीवलभद्र जीवात्मा,  श्रीसुभद्रा मायाशक्ति और श्रीसुदर्शन क्रियाशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। श्रीजगन्नाथ ही सकल सृष्टि का कारण हैं,  कहकर रामानुजाचार्य ने  उन्...

रसालानां राजा भवति

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  रसालानां राजा भवति             @मानव वैदिक काल से ही आम फलों का राजा है; आम का पेड़ वसंत ऋतु का प्रिय और सदा रमणीय होता है;  यह सभी रसीले फलों का  राजा माना जाता है। रूपेण सुभगो रम्यो  वसन्तदूतप्रियः सदा।  आम्रवृक्षो रसालानां राजा भवति सर्वदा।। भारत में आम सिर्फ एक फल नहीं अपितु धूप,मिट्टी की सुगंध,  बचपन की दोपहरी और सँस्कृति का रस है। भारत में लोग जेठ की गर्मी और लू की तपिश इसी एक फल के सहारे सानन्द जी जाते हैं। यहाँ गर्मी की छुट्टियाँ यानी आम, हर किस्म का आम! कच्ची अमिया चुराकर  आपस में बाँटकर नमक मिर्च से खाना। वो आम का अचार जो दादी नानी धूप में सुखाती थीं; वो आम का पना जो लू से बचने के लिए  आदतन पिलाया जाता था,  वो आमरस-पूरी की दावत  जो पूरे कुनबे को जोड़ती थी। वह बगीचे के आम का पककर चूना! वह छत पर खटिया लगाकर बाल्टी में ठण्डे पानी में भरे आम और घर भर की चारों ओर  जुटी चुहल कमेटी। आम के असली चाहने वाले आम और स्वाद के बीच  किसी प्रकार का अवरोध नहीं चाहते; आम को धोया,दबाया और सीधे आम के रस के...

समत्वं योगः उच्यते

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  अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर, समत्वं योगः उच्यते                @मानव यदि मन की हलचल और गतिविधियों को निश्चल कर लें तो योग की स्थिति आती है तब चेतना में सब कुछ एक हो जाता है यही 'चित्त वृत्ति निरोध' है। यह मानव को उस चीज से  मुक्त करता है, जो वह खोज रहा है; वह चाहे उसके भीतर हो या बाहर; यह हर चीज से मुक्त करता है। पतंजलि का 'चित्त वृत्ति निरोध '  हमें हमारी मुक्ति या आत्म-ज्ञान की ओर ले जा सकती है। योग का अर्थ है जुड़ना,  योग-शास्त्र के अनुसार  योग एक विशेष प्रकार से  सायास जुड़ने का नाम है।  योग विद्या के आलोक में  अंतर और बाह्य जगत के साथ हमारा रिश्ता नया ओजस्वी अर्थ प्राप्त कर लेता है। यम और नियम नैतिक जीवन जीने की  प्रक्रिया बताते हैं तो आसन शरीर का रख-रखाव और उसकी क्षमता को  सँवर्धित करने का काम करते हैं। प्राणायाम हमारे श्वास और प्राणिक ऊर्जा को  व्यवस्थित करते हैं; प्रत्याहार बाह्य दुनिया के साथ विवेकपूर्ण संबंध को  नियमित करता है। ध्यान, धारणा और समाधि  अँतरंग योग हैं, जो चेतन...

सोमवती अमावस्या

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  पुरुषोत्तम मास की सोमवती अमावस्या     @मानव भारतीय संस्कृति में पर्व,व्रत और विशेष तिथियाँ धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही आत्मचिंतन,आत्मशोधन  और आध्यात्मिक उन्नति के  महत्वपूर्ण अवसर हैं। ये पर्व और साधना-पर्व व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने और आत्मविकास के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं। सोमवती अमावस्या और पुरुषोत्तम मास तीन श्रेणी के अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर हैं जिनका शुभ सँयोग  साधना,उपासना और आत्मपरिष्कार के लिए अधिक पुण्यदायी हैं। भारतीय ज्योतिष एवं आध्यात्मिक परंपरा में  सोमवार का संबंध भगवान शिव तथा मन के अधिष्ठाता चंद्रमा से है। चंद्रमा मन का प्रतीक है  और अमावस्या आत्ममंथन का अवसर, इसलिए सोमवती अमावस्या मन की शुद्धि, विचारों के परिष्कार,सँयम  और आध्यात्मिक जागरण के लिए विशेष फलदायी माना गया है। यह तिथि व्यक्ति को बाह्य व्यस्तताओं से हटकर  अपने अंत:करण की ओर देखने और जीवन की दिशा का  पुनर्मूल्याँकन करने की प्रेरणा देती है। जबकि अधिक मास  भगवान विष्णु का प्रिय मास है जिसका मूल उद्देश्य मनुष्य को साँसारिक व्य...

प्रकृति-शुभेषु भारतीयता

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  विश्व पर्यावरण दिवस पर, प्रकृति-शुभेषु भारतीयता                @मानव भारतीय सँस्कृति पृथ्वी को  केवल भौतिक सँसाधन नहीं वरन माँ के रूप में पूजती है, अतः पर्यावरण सँरक्षण हमारी परंपरा और जीवन-पद्धति का अङ्ग है। पर्यावरण सँरक्षण का दृष्टिकोण सामाजिक,धार्मिक और नैतिक मूल्यों से भी  गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रकृति के साथ हमारी एक टिकाऊ तथा संतुलित संबंध हैं जिसकी भावना लोगों के सँस्कारों और जीवनशैली में रची-बसी है, जिसे वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी  निभाते चले आ रहे हैं। जँगल,पृथ्वी,आकाश,  जल,वायु और अग्नि जैसे  प्राकृतिक तत्व हमारी  सभ्यता,सँस्कृति और जीवन-दर्शन का  अभिन्न अङ्ग हैं। उगते हुए सूर्य, प्रभात की लालिमा, प्रकृति की निस्तब्धता और उसकी मधुरता का  सुंदर और सँवेदनशील चित्रण वेदों में उपलब्ध है। वेदों में जीवन और प्रकृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए माने गए हैं; वहाँ प्रकृति भौतिक सँसाधन नहीं, बल्कि जीवन की सहचरी  और प्रेरणा-शक्ति के रूप में  प्रस्तुत की गई है। अनुष्ठानों में शाँति मंत्र पाठ का मूल ...

पुरुषोत्तम मास

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  पुरुषोत्तम मास (अधिक मास)            @मानव भगवान विष्णु को समर्पित भक्ति,सेवा और साधना के श्रेष्ठकाल-रूप में स्वीकृत पुरुषोत्तम मास को लोकसंस्कृति ने भजन-कीर्तन के विधान से जोड़ दिया। सूर्य व चन्द्र मास की गणना में शास्त्रानुसार उत्पन्न अंतर का सँतुलन करने के लिए अभिकल्पित अतिरिक्त मास  सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र,दुर्लभ और पुण्यदायी मास है। प्रारंभ में उपेक्षित होने के कारण इसे 'मलमास' कहा गया,  पर श्रीहरि विष्णु ने इसे  अपना स्वरूप और नाम देकर 'पुरुषोत्तम मास' के रूप में  सर्वोच्च स्थान दिया। यह एक महीना सँसार की भागदौड़ से रुककर अपनी माटी, अपनी सँस्कृति और अपनी जड़ों की ओर  लौटने का ईश्वरीय निमंत्रण है। लोकमानस का विश्वास है  कि पुरुषोत्तम मास में जप-तप, कथा श्रवण, भजन-कीर्तन, दान-पुण्य और अभावग्रस्त की सेवा से  अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। गोवर्धनधरं वंदे गोपालं गोपीवल्लभम्।  विष्णुं जिष्णुं जगन्नाथं  राधाकृष्णं नमोऽस्तुते ।। पुरुषोत्तम मास को ही  आत्ममंथन का समय कहकर, इस मास में स्वयं को आत्मन्न...

पत्रकारिता की शक्ति

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  हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर, पत्रकारिता की शक्ति               @मानव समाचारों का सँप्रेषण मात्र पत्रकारिता नहीं, वरन् यह समाज की चेतना,  लोकतँत्र की आत्मा और जनभावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति का जीवन्त माध्यम है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य  सत्य को सामने लाना,  जनहित के मुद्दों को उठाना  और सत्ता तथा समाज के बीच  एक जिम्मेदार सेतु बनना है। निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार लोकतंत्र का प्रहरी है जो घटना वर्णन से इतर  समाज को जागरूक, शिक्षित और सँवेदनशील बनाने का  दायित्व निभाता है। पत्रकारिता के दो शतक वर्ष केवल ऐतिहासिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सत्य,साहस और जनसेवा की वह निरंतर यात्रा है जिसने समाज को दिशा देने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। भारत में पत्रकारिता स्वतँत्रता सँग्राम के समय केवल व्यवसाय नहीं थी,  बल्कि राष्ट्रसेवा का एक पावन मिशन थी, जिसने जनजागरण कर आँग्ल शासन के विरुद्ध  लेखनी को हथियार बनाया और जनता में स्वतँत्रता की  अमोघ अलख जगाई। विश्वसनीयता पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूँजी है; अतः पत्रकारों का दाय...