गुरु महिमा
गुरु पूर्णिमा पर, गुरु महिमा @मानव मानव-शरीर दुर्लभ नाव है भगवत्कृपा अनुकूल वायु है और गुरु इस नाव के खेवनहार हैं। इस दुर्लभ सँयोग का लाभ लेकर भवसिंधु के पार जाना ही मानव-जीवन का परम फल है। (श्रीमद्भागवत महापुराण) शब्द की यात्रा जिस अर्थ की प्रतीति कराती है, वह अर्थबोध गुरुकृपा से ही घटित होता है। जिसके अंतःकरण में ईश्वर के समान ही गुरु के प्रति भक्ति होती है, शास्त्र अपने रहस्यों को उसके हृदय में प्रकट कर देते हैं। (श्वेताश्वतर उपनिषद) गुरु ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं और वही साक्षात ईश्वर हैं; गुरु ब्रह्मा के समान ज्ञान का सृजन करते हैं, विष्णु के समान शिष्य का संरक्षण करते हैं और महेश्वर के समान अज्ञान का नाश करते हैं। गुरु ही वह शक्ति हैं, जो मनुष्य को सत्य,ज्ञान और श्रेष्ठ जीवन का मार्ग दिखाते हैं। गुरु मात्र ज्ञान प्रदाता अथवा शिक्षक नहीं होते, वे जीवन को उच्चादर्श का विवेक देने वाले प्रकाशपुंज होते हैं और शिष्य के व्यक्त्तित्व को आकार प्...