युग चेतना का पर्व
वसंत पञ्चमी पर, युग चेतना का पर्व @मानव वसंत प्रकृति को उसकी नींद से जगाता है; पीले सरसों की गंध जैसे हवा में घुल जाती है, वैसे ही वसंत पञ्चमी आते ही समय का रंग बदलने लगता है। शीत के लंबे मौन के बाद धरती पहली बार अपने भीतर की बात कहती है- धीरे,संकोच से, पर पूरी स्पष्टता के साथ। यह कोई घोषणा नहीं, बल्कि एक फुसफुसाहट है, जिसे केवल वही सुन पाता है, जो मौसमों को केवल देखता नहीं, उनको जीता है; वसंत पञ्चमी इसी फुसफुसाहट का नाम है। कल्पना प्रधान कवियों की तरह यह दिन प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि नहीं मानता, बल्कि मनुष्य के भीतर की सँवेदना का विस्तार बना देता है; यहाँ भी बाहर का दृश्य भीतर की अनुभूति बन जाता है। भारतीय दृष्टि में वसंत पञ्चमी ज्ञान और सौंदर्य का सँयुक्त उत्सव है, जबकि पश्चिमी चिंतन में यह दिन 'बीइंग' से अधिक 'बीकमिंग' का उत्सव लगता है। सरसों के फूल किसी खेत में नहीं, हमारी स्मृतियों में खिलते हैं; वसंत पञ्चमी इसीलिए एक तिथि से अधिक एक मनःस्थिति है। वसंत पञ्चमी पर्व ऋतु ...