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विवेकपूर्ण जीवन ही गणेश पूजा

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  विवेकपूर्ण जीवन ही गणेश पूजा      @मानव गणेशजी विनय और विवेक के देवता हैं, व्यक्ति के जीवन में विनय और विवेक बना रहे, यही गणेश पूजा है। कोई धर्म विवेक को  अस्वीकार नहीं कर सकता, विवेकपूर्ण होना ही गणेश पूजा है। विवेक से नाक बढ़ेगी, यानी प्रतिष्ठा बढ़ेगी; विवेक सारभौम सूत्र है; यह जगत कल्याण, मानव कल्याण का सूत्र है। गणेशजी को मोदक पसंद हैं; मोद का का अर्थ है आनंद; कः का अर्थ है 'छोटा अंश'; आध्यात्मिक रूप से यह  ज्ञान,मोक्ष और परमानंद का प्रतीक है। हाथ में पकड़ा हुआ मोदक इस बात का प्रतीक है कि गणेशजी के पास  अपने भक्तों को आनन्द प्रदान करने की क्षमता है; जहाँ विवेक होता है, वहाँ आनंद आ ही जाता है। विवेक सही और गलत की पहचान करवाता है; विवेकपूर्ण निर्णय लेकर जब व्यक्ति सही मार्ग पर चलता है तो बाधाओं से भी बच जाता है। इसीलिए विवेक रूपी गणेशजी को विघ्नहर्ता 'बताया गया है; क्योंकि विवेक में विघ्न को हरने की क्षमता होती है। मोद यानी सहज आनंद पाने में तीन चीजें बाधक हैं ईर्ष्या,निंदा और द्वेष; विवेक हमें समझ देता है कि इनकी कोई जरूरत नहीं है। विवेक कहता है क...

हिन्दी दिवस (लघु कथा)

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  लघु कथा            हिन्दी दिवस            @मानव साहब के चैम्बर से निकलती सहकर्मी मैडम नीति को अपनी सीट पर तेजी से जाता देख मैने पूँछ ही लिया -"क्या बात है मैडम? " "आज 14 सितम्बर है न! " वे तपाक से बोलीं|"साहब ने हिन्दी दिवस पर एक मीटिंग अरेंज करने की नोटिस निकालने के लिए बोला है  |" मैं सोचने लगा- साल भर अंग्रेजी लैंग्वेज वाले कम्प्यूटर पर काम करते-करते चलो इसी बहाने आज एक दिन हिन्दी को याद तो कर लिया जाएगा  | पिछले साल तो कानवेन्टी साहब ने हिंग्लिश में हिन्दी के पुनरुत्थान के लिए  एक लंबा सा लेक्चर पिलाया था  | फिर भी एक सज्जन हरदेव प्रसाद बाहरी आदि को पढ़ कर आए थे और बढ़िया बोले भी |एक ने निशंक जी की कविता सस्वर सुनाई थी तो एक ने स्वरचना भी पढ़ी थी  | पर इस बार तो कार्यक्रम को मनाने की पूर्व सूचना भी नहीं दी गई थी | फिर भी मैं कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अपने पुराने विचार व अध्ययन कुरेदने लगा और धीरे - धीरे अपने काम में लग गया | शाम चपरासी खुला नोटिस रजिस्टर लिए आया और सामने रख कर बोला - "साह...

अपराजेय उपलब्धि

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  राजभाषा दिवस पर, अपराजेय उपलब्धि             @मानव किसी भाषा की प्रतिष्ठा तब उत्कर्ष पर पहुँचती है, जब उसके शब्दों को सँसार तक पहुँचाने के लिए अनुवाद की बैसाखी की  आवश्यकता नहीं होती। भाषा का मतलब सिर्फ जीभ नहीं है, भाषा हमारा मन और माथा है साथ में स्वाभिमान भी! चाहे सैन्य अभियान हो या रक्षा उत्पाद अंतरिक्ष की उड़ान हो या चंद्रयान से प्रज्ञान हर जगह गुंजायमान हो रही है हिंदी की पदचाप! राष्ट्र अपनी उपलब्धियों को जब अपने शब्द देता है तब सँसार उन्हीं शब्दों में  उन्हें पहचानने लगता है। अग्नि से आकाश तक, तेजस से अरिहंत  और मेघदूत से सिंदूर तक;  आधुनिक भारत के विज्ञान अनुसन्धान, सूचना प्रौद्योगिकी, सैन्य कार्यवाही, रक्षा उपलब्धियों में हर जगह हर प्रकार से दीप्त हो रही है अपनी भाषा! इन परिचित शब्दों में निजी वेदना, सामाजिक सँवेदना और राष्ट्रीय प्रत्युत्तर एक साथ ध्वनित हुए हैं; जिनका अर्थ देश को  समझाना नहीं पड़ा। साँस्कृतिक शब्द की यही शक्ति है; कोश उसका अर्थ कुछ पँक्तियों में बता सकता है, किंतु समाज उसमें सदियों का अनुभव सँचित करत...

धरती बचाने का सँकल्प

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वराह जयन्ती (१३ सितम्बर) पर धरती बचाने का सँकल्प          @मानव नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम्।  खुरमध्यगतो यस्य मेरुः खणखणायते।। धरती केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन का आधार है; जल,जंगल,जमीन,वायु  और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को बचाना हम सभी का दायित्व है। श्रीविष्णु का वराह अवतार  हमें प्रकृति का सम्मान करने, संकट में साहस बनाए रखने और धर्म के मार्ग पर बढ़ने की अविरल प्रेरणा देता है। वराह अवतार का सँदेश पृथ्वी की रक्षा से तो जुड़ा ही है यह हमें याद दिलाती है कि पृथ्वी की रक्षा किसी एक का दायित्व नहीं। इसमें सबका प्रयास बड़ा परिवर्तन ला सकता है; पावन धरती के प्रति यही हमारी श्रद्धा है।   ✒️मनोज श्रीवास्तव

विलक्षण ग्रन्थ

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  श्रीगुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश वर्ष (१२ सितम्बर) विलक्षण ग्रन्थ        @मानव श्रीगुरु ग्रंथ साहिब के सम्मुख नतमस्तक होने का अर्थ है भारतीय अध्यात्म,दर्शन  व नैतिक मूल्यों के प्रति  आस्था रखना। श्रीगुरु ग्रंथ साहिब  मध्यकालीन भारतीय संस्कृति का विलक्षण ग्रंथ है; जिसका मूल भाव मानव कल्याण है, जिसमें छत्तीस वाणीकारों की वाणी संकलित हैं। आठ शताब्दियों का  भारतीय चिंतन,दर्शन  और अध्यात्म भी इसमें समाहित है; अध्यात्म के मौलिक सिद्धांत इसमें सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। यहाँ भारतीय अध्यात्म के  महापुरुषों की वाणियों को निर्गुण काव्य की केंद्रीय संवेदना के साथ भी नए अध्यात्मवाद के साथ  देखा जा सकता है। गुरमत दर्शन' के मौलिक चिंतन के माध्यम से श्रीगुरु ग्रंथ साहिब में ये वाणीकार निराकार की भक्ति,प्रेम एवं उनकी अनुभूतियों को  सरल व व्यावहारिक रूप में जनहित के साथ त्याग,सेवा,भाईचारा,समता और सामाजिक चिंतन के  कल्याण मार्ग को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। श्रीगुरु ग्रंथ साहिब में  भारतीय संगीत की  दार्शनिक व्याख्या ...

गुरु तत्त्व की विराट परिभाषा

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  जन्माष्टमी पर, गुरु तत्त्व की विराट परिभाषा          @मानव श्रीकृष्ण एक ओर माखन चुराते  नटखट कान्हा का बालरूप हैं, जो जीवन में सहजता,आनंद और सरलता भर देता है  तो दूसरी ओर कुरुक्षेत्र के रण में खड़े योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं,  जिनके मुख से निकली  श्रीमद्भगवद्‌गीता आज भी मानवता के लिए जीवन का सर्वोच्च पाठ है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को  युद्ध करना नहीं सिखाया,  बल्कि परिस्थितियों से  भागने के बजाय अपने कर्तव्य को  पहचानना सिखाया; उन्होंने बताया कि कर्म  हमारे हाथ में होते हैं,  परिणाम नहीं। उन्होंने संशय में डूबे शिष्य को आत्मविश्वास दिया, मोह में उलझे मन को  विवेक दिया और निराशा के उस क्षण में कर्तव्य का दीप जलाया; यही वजह है कि 'कृष्णं वन्दे जगद्‌गुरुम्'  केवल एक स्तुति नहीं,  गुरु तत्व की विराट परिभाषा है। श्रीकृष्ण हमें स्मरण कराते हैं कि शिक्षा का अर्थ केवल जानना नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने की  क्षमता विकसित करना है। भगवान से संबंध की स्थापना भागवत है।  श्रीकृष्ण का विश्वरूप...

राखी की डोर

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  राखी की डोर           @मानव बारिश की बूँदों की  रुनझुन के बीच आता है रक्षाबंधन! साधारण से राखी के धागे में भाई-बहन के प्रेम,विश्वास  और भावनाओं की पूरी दुनिया समाई होती है। रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रति प्रेम,विश्वास और दायित्व का बंधन है; राखी का सूत्र होने से पहले, यह आत्माओं के बीच  एक स्नेहसिक्त बंधन का  पावन प्रतीक है। आधुनिकता की आँधी के बावजूद कम नहीं हुआ है  भाई-बहन के बीच स्नेह! एक ऐसा रिश्ता जिसकी घनी छाँव में सदा बैठा होता है बचपन! समय बदलता है, दायित्व बढ़ते हैं, परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन बचपन का अपनत्व सदा रहता है। किसी रीति-रिवाज के कारण हमारे सँबंध नहीं, बल्कि एक-दूसरे को आवश्यक समय,ध्यान और ऊर्जा देने से प्रगाढ़ बनते हैं। इसलिए राखी केवल त्योहार नहीं, बल्कि पुरानी स्मृतियों को  फिर से जी लेने का  अवसर भी है। यहाँ रक्षा का अर्थ केवल शरीर की रक्षा ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान, सपनों,आत्मविश्वास और गरिमा की रक्षा करना भी है। हमें केवल शरीर की नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान, सपनों,आत्मविश्वास और गरिम...