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युग चेतना का पर्व

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  वसंत पञ्चमी पर, युग चेतना का पर्व             @मानव वसंत प्रकृति को उसकी नींद से जगाता है; पीले सरसों की गंध जैसे हवा में घुल जाती है,  वैसे ही वसंत पञ्चमी आते ही  समय का रंग बदलने लगता है। शीत के लंबे मौन के बाद  धरती पहली बार अपने भीतर की बात कहती है- धीरे,संकोच से, पर पूरी स्पष्टता के साथ।  यह कोई घोषणा नहीं,  बल्कि एक फुसफुसाहट है,  जिसे केवल वही सुन पाता है, जो मौसमों को केवल देखता नहीं, उनको जीता है; वसंत पञ्चमी इसी फुसफुसाहट का नाम है। कल्पना प्रधान कवियों की तरह यह दिन प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि नहीं मानता,  बल्कि मनुष्य के भीतर की  सँवेदना का विस्तार बना देता है; यहाँ भी बाहर का दृश्य  भीतर की अनुभूति बन जाता है। भारतीय दृष्टि में वसंत पञ्चमी ज्ञान और सौंदर्य का सँयुक्त उत्सव है,  जबकि पश्चिमी चिंतन में यह दिन 'बीइंग' से अधिक 'बीकमिंग' का उत्सव लगता है। सरसों के फूल किसी खेत में नहीं, हमारी स्मृतियों में खिलते हैं;  वसंत पञ्चमी इसीलिए एक तिथि से अधिक एक मनःस्थिति है। वसंत पञ्चमी पर्व ऋतु ...

मौन की साधना

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  मौनी अमावस्या पर, मौन की साधना               @मानव मौन साधनाओं का आधार है। 'मौनं सर्वार्थ साधनम्।' इससे प्राणी में आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है। किसी भी सिद्धि को प्राप्त करने का मूल आधार  प्राण शक्ति सँचित रखना है, वाणी का सँयम ही मन-मस्तिष्क को  एकाग्रचित्त रखने का अचूक साधन है। सनातन में मौन व्रत  अत्यंत महत्वपूर्ण है; मौन रहकर सभी कार्य सिद्ध किए जा सकते हैं या उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है। दार्शनिक दृष्टिकोण से वाणी पर विराम देकर मन के झंझावातों में उलझे रहना मौन नहीं है; वाणी और मन, दोनों का शाँत होना मौन है।  वाणी पर विराम देकर  अंतर्मन के तमाम कोलाहल पर नियंत्रण और मन की वृत्तियों का  शमन करना मौन है। वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यधिक,अर्थहीन एवं अनर्गल वार्तालाप से  शरीर की आँतरिक ऊर्जा का  ह्रास होता है; इस ऊर्जा को मौन साधना से सेवित किया जा सकता है। मौन रहकर आँतरिक ऊर्जा  एवं आध्यात्मिक ऊर्जा में  वृद्धि की जा सकती है; मन,विचार एवं वाणी पर  सँयम रखकर जब हम 'मौन' रहते ...

जीवन का गतिमयता-पर्व

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  मकर संक्रांति पर्व पर, जीवन का गतिमयता-पर्व          @मानव भारतीय सँस्कृति में  मकर सँक्रांति का पर्व केवल एक तिथि नहीं,  बल्कि ऋतु परिवर्तन,  सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। मकर राशि में सूर्य के सँक्रमण को मकर सँक्रांन्ति कहते हैं।  सूर्य की गति तथा राशियों के प्रभावों वाला यह साँस्कृतिक पर्व हमें जीवन की परिवर्तनशीलता के सहज स्वभाव की ओर  उन्मुख करता है। यह वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन से  उत्तरायण को अग्रसर होता है और प्रकृति के साथ-साथ  मानव जीवन में भी नई ऊर्जा का सँचार होता है। तमसो मा ज्योतिर्गमय की  वैदिक प्रार्थना दोहराने वाले  भारत देश में सूर्य को जीवन के केंद्र में माना है; जहाँ वेदोक्त है कि सूर्य जड़-चेतन जगत की आत्मा है। ‘ सूर्य आत्मा जगतः तस्थुषश्च। ’ आध्यात्मिक,आधिदैविक  तथा आधिभौतिक स्तरों पर  समायोजित मानव-जीवन में मकर सँक्रांति भारतीयता का साँस्कृतिक प्रतिनिधित्व  करता हुआ पर्व है। समय की चाल ऋतु-प्रभाव को पहचानने  तथा समग्र पर्यावरणीय  ताने-बाने...

ऊष्मा व ऊर्जा वाहक पर्व

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लोहड़ी पर्व पर, ऊष्मा व ऊर्जा वाहक पर्व              @मानव ऊर्जा और ऊष्मा की वाहक है-अग्नि; इसे केंद्र में रखकर लोहड़ी मनाई जाती है, जो परिवारिक संबंधों में  ऊष्मा का संचार करती है। ऊष्णता व ऊर्जा का  सँचार करने वाला यह वह पर्व है जो भारतीय समाज एवं परिवार को शक्ति भी देता है और भविष्य के प्रति  आस्थावान भी बनाता है।  बच्चे के जन्म के समय  पहले वर्ष में उसकी आमद को लोहड़ी की पवित्रता से जोड़ कर अनेक शुभ कार्य होते हैं जिनकी साक्षी होती है अग्नि। अग्नि धरती का श्रृंगार है; अग्नि के बिना शक्ति और भक्ति के सँकल्पों की सिद्धि नहीं होती। ऋग्वेद के अग्नि सूत्र से पँजाब की पावन धरा पर  ऋषियों ने अग्नि पूजा का  विशाल सिद्धांत रखा था।  पर्यावरण के प्रति पँजाब का यह संदेश आज विश्व को दिशा देता है; लोहड़ी इसी का अटूट हिस्सा है; पँजाब के विलक्षण पर्व लोहड़ी का पँजाबी वर्ष भर इंतजार करते हैं। पँजाब में बच्चियों की लोहड़ी ने लिंग भेद समाप्त कर दिया है; पँजाब के प्रत्येक गाँव में  धीयाँ दी लोहड़ी पर्व मना कर पँजाबी अपने प्रग...

स्वागत नववर्ष का

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  स्वागत  नववर्ष का                  @मानव केवल कैलेंडर का पन्ना बदलना नहीं, अपितु जीवन के कालचक्र में खड़े होकर स्वयं से प्रश्न करने का अवसर है नया साल। जिस क्षण पुराने वर्ष को  हम अलविदा कहते हैं और नए वर्ष का स्वागत करते हैं, उसी क्षण जीवन के दो पहिए अलविदा और अगवानी,  एक साथ घूमते दिखते हैं।  एक पहिया पीछे छूटते  अनुभवों,सफलताओं और विफलताओं का है, तो दूसरा आगे खुलते  अवसरों,आशाओं और सँभावनाओं का। इन्हीं दोनों के मध्य खड़ा मनुष्य तय करता है कि उसे आगे किस दिशा में जाना है। अलविदा कहना बीते समय से विदा लेना ही नहीं, बल्कि उन आदतों,विचारों  और प्रवृत्तियों से विदाई भी है जो हमारे जीवन को बोझिल बनाती रही हैं। हमें अलविदा कहना होगा  नकारात्मकता को, निराशा को, आलस्य को, द्वेष और असहिष्णुता को।  उस अहंकार को भी  अलविदा कहना होगा, जो हमें दूसरों से दूर करता है  और उस भय को भी, जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है। अलविदा उन शिकायतों को, जो हम बार-बार दोहराते हैं,  पर समाधान की ओर कदम नहीं ...

गीता एक दिव्य प्रेरणा

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  गीता जयन्ती पर गीता एक दिव्य प्रेरणा             @मानव श्रीकृष्ण तथा अर्जुन का सँवाद मानव जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के मानस में  हो रहे अँतद्वंद्वों का भी  प्रतीक है। अर्जुन के मन में जो सँघर्ष पैदा हुआ वही तो हर व्यक्ति के मानस में चलायमान रहता है; भीतरी सँघर्ष के समय में मनुष्य की आत्मा निर्बल पड़ जाती है। गीता में वर्णित श्रीकृष्ण का चिंतन जीवन की ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य को दिव्य साँत्वना  प्रदान करता है। श्रीकृष्ण द्वारा गीता के ज्ञान में जीवन की परम शाँति,  लौकिक तथा पारलौकिक  कल्याण का चिंतन,समावेशित है। गीता का सार्वभौमिक चिंतन गहन होते हुए भी जीवन का स्पष्ट मार्ग प्रदर्शन करता है। भक्ति योग,ज्ञान योग और कर्म योग की त्रिवेणी  इस पावन गीता में मानव जीवन से सँबंधित  दुखों और समस्याओं का  समाधान निहित है। जीवन पथ पर बढ़ते हुए  प्रत्येक मानव के जीवन में  ऐसी विकट परिस्थितियाँ  उपस्थित हो जाती हैं,  जिनसे वह हताश,निराश  तथा दुखी हो जाता है।   गीता का चिंतन मनुष्य को कामना तथा...

तमसो मा ज्योतिर्गमय

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  देव दीपावली पर, तमसो मा ज्योतिर्गमय                @मानव शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा ।  शत्रुबुद्धिविनाशाय  दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥ जो शुभ,कल्याण,आरोग्य  और धन सम्पत्ति प्रदान करे  तथा शत्रु बुद्धि का नाश करे, उस दीपज्योति को नमस्कार है। भारत की साँस्कृतिक परंपराएँ केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के उच्चतम आदर्शों की अभिव्यक्ति हैं; इन्हीं में से एक है देव दीपावली। दीपों की झिलमिलाहट के बीच गूँजती गङ्गा आरती की स्वर लहरियाँ केवल धार्मिक उत्सव नहीं,  बल्कि अध्यात्म,सँस्कृति  और विज्ञान का समन्वित रूप अनुभव कराती है। देव दीपावली का मूल भाव है ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' जब सँपूर्ण काशी  दीपमालाओं से आलोकित होती है, तो यह केवल बाहरी प्रकाश नहीं, बल्कि अंतर्मन की जागृति का प्रतीक होती है। प्रत्येक दीपक हमें सिखाता है कि जैसे वह स्वयं जलकर  दूसरों को प्रकाश देता है,  वैसे ही मनुष्य को भी अपने भीतर के अहंकार और नकारात्मकता को जलाकर समाज में प्रेम,ज्ञान और सद्भावना का आलोक  फैलाना होगा। त्रिपुरासुर ...