Posts

न मातुः पर दैवतम्

Image
विश्व मातृ दिवस पर  न मातुः पर दैवतम्        @मानव "माँ" एक ऐसा शब्द है जिसमें इस पूरी सृष्टि को  अपने अंदर समा लेने की  असीम क्षमता है। यह एक शब्द ही नहीं है,  यह सँबंधों की श्रृंखला है,  यह भावनाओं का भवसागर है, यह सँस्कारों का व्यापक कोश है और यह प्रेम और स्नेह की वैतरणी भी है। अतः यह अलौकिक और अपरिहार्य सँबंध है। भारतीय जीवन में आत्मीय और पारिवारिक सँबंधों की व्याख्या का आधार स्नेह और सम्मान ही है; इसलिए हमारे हर सँबंध का न सिर्फ एक नाम है बल्कि परिवार में उसके लिए स्थान भी निर्धारित है। जब सामाजिक ताने-बाने में सँबंधों के निर्वहन की इतनी स्पष्टता हो तो हर एक सँबंध का जीवन में स्थान और महत्व निर्धारित हो ही जाता है; सिर्फ माँ का ही सँबंध है जो इसका अपवाद है।  माता अलग-अलग रूपों  तथा भूमिकाओं में हमारे साथ सदा रहती है, इसलिए समाज में  अलग-अलग प्रसंगों में  व्यक्ति या प्रतीक को माता का स्थान दिया जाता है। माँ सिर्फ जन्मदात्री ही नहीं होती, माँ सबसे अच्छी मित्र होती है और सबसे पहली गुरु भी सभी गुरुओं में माता सर्वश्रेष्ठ ...

बुद्धिमतां वरिष्ठम्

Image
  ज्येष्ठ का प्रथम मङ्गल बुद्धिमतां वरिष्ठम्          @मानव महाबली हनुमान राम नाम का उद्घोष करके  लँका दहन के पश्चात  उच्च अट्टहास करते हैं जिससे निशाचर स्त्रियों का  गर्भपात हो जाता है-  चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥ गुणों को लेना और दोषों को समाप्त करना; इसी प्रक्रिया के द्वारा हमें भी अपने चित्त को पवित्र करके दुर्वृत्तियों को समाप्त करना है यही विश्व को सँदेश है कि बाहर नहीं, रामराज्य पहले अंदर बनाना होगा।  हनुमान जी का सहज स्वरूप ही उस अखण्ड,व्यापक,अनंतरूप  राम को पाकर धन्य है,  जिसके कारण उनके  अंत:करण में पाने और छोड़ने का सँकल्प और विकल्प कभी आता ही नहीं है। ज्ञान स्थिति में सत की विस्मृति उनका स्वरूप है; हनुमान अक्षर स्वरूप होने के कारण उनका क्षरण और क्षय  कभी नहीं होता है। उनको अग्नि जला नहीं सकी, पानी डुबा नहीं सका, वायु के वे स्वयं पुत्र हैं; हनुमान जी में अज्ञान जनित अविद्या का अभाव है ऐसा है, जैसे अग्नि में शीतलता सँभव नहीं, बर्फ में गर्मी सँभव नहीं है; ज्ञान में अज्ञान का...

सद्ज्ञान दाता

Image
  नारद जयन्ती पर, सद्ज्ञान दाता       @मानव विश्वकल्याण को चिंतन के केंद्र में रखती है भारतीय ऋषि-परंपरा! विश्व को ब्रह्म की ही  अभिव्यक्ति मानने से यह भाव सुसंगत एवं पुष्ट होता है। चारों युगों के काल-प्रवाह में  हमारी ऋषि-परंपरा सबके माँगल्य की प्रार्थना करती है। ज्ञान-भक्ति एवं वैराग्य के  मूर्तिमान स्वरूप श्रीनारद जी को सँपूर्ण आर्ष वाङ्गमय में  विशेष महत्व प्राप्त है।  उनके स्वरूप का निरूपण  नाम के आधार पर किया गया है अबोध जनों को ज्ञान देने वाले और स्वयं सर्वथा बालकवत  निरभिमान रहने वाले,  अनेक जन्मों का स्मरण  रखने वाले परम ज्ञानी होने से ये नारद कहलाते हैं। ददाति नारं ज्ञानं च  बालकेभ्यश्च बालकः।  जातिस्मरो महाज्ञानी तेनेयं नारदाभिधः।। ‘नार’ का अर्थ है ज्ञान,  सबको ज्ञान का प्रसाद  बांटने से नारद कहलाए,  ऐसा भी कहा जाता है।  लोकपितामह ब्रह्मा जी के  मानस-पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले श्रीनारद जी  वस्तुतः भगवान की  मंगलमयी विभूति ही हैं, जो जगत्कल्याण हेतु  समस...

ज्ञान परम्परा के अविरत

Image
  बुद्ध पूर्णिमा पर, ज्ञान परम्परा के अविरत          @मानव भारतीय परंपरा में बुद्ध केवल बौद्ध धर्म के प्रवर्तक नहीं,  बल्कि सनातन वैदिक धरोहर के  एक दिव्य आयाम के रूप में  प्रतिष्ठित हैं। पुराणों में भगवान विष्णु के  अवतार-रूप में स्वीकरण  स्पष्ट करने को पर्याप्त है कि बौद्ध और जैन परंपराएं  भारतीय आध्यात्मिक परिपाटी से सर्वथा अपृथक हैं, उसी के व्यापक,समावेशी  स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं। बुद्ध पूर्णिमा केवल ऐतिहासिक स्मरण दिवस नहीं, अपितु भारतीय  आध्यात्मिक चेतना के सातत्य,समन्वय और सार्वभौमिक करुणा के  उद्घोष का पावन अवसर है। इस दिन हम भगवान बुद्ध के  जन्म,ज्ञानप्राप्ति और महापरिनिर्वाण तीनों महत्वपूर्ण घटनाओं का  एक साथ स्मरण करते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में साधना के दो प्रमुख मार्ग प्रमाण और प्रयोग मार्ग हैं जिनमें भगवान बुद्ध ने मुख्यतः प्रयोग मार्ग अपनाया, जिसमें प्रत्यक्ष अनुभव और साधना से  साधक प्रारंभ करता है और अनुभवजन्य सत्य से ज्ञान की प्राप्ति करता है। यद्यपि दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य,मोक...

सोना कितना सोणा

Image
  अक्षय तृतीया पर, सोना कितना सोणा           @मानव भारतीय सँस्कृति में, स्वर्ण का अलग ही वैशिष्ट्य है; भारतीय समाज में स्वर्ण  सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि अर्थ,आस्थाऔर अस्मिता तीनों का मेल है। भारतीय सँस्कृति में स्वर्ण पूज्य है और है सभी सँस्कार का अङ्ग; यह है हर सँकट का साथी; हमारे देश में सोना सिर्फ धातु नहीं, भावना और भरोसा भी है। सोना हर घर का इमरजेंसी फण्ड है। इस चमकदार पीली धातु को धन,शक्ति और प्रतिष्ठा का  प्रतीक माना जाता रहा है; मंहगाई या मन्दी में भी सोने का भाव आमतौर पर टिकता है,  इसलिए इसे सबसे सुरक्षित  निवेश माना जाता है। हमारी भारतीय सँस्कृति में  स्वर्ण पूज्य है; धार्मिक अनुष्ठानों का  अभिन्न अंग है; हमारे यहाँ स्वर्ण सौभाग्य का कारण माना जाता है। लोकमानस में सोने के प्रति  आध्यात्मिक पवित्रता का भाव है; देवालयों में इष्ट देवी-देवता  स्वर्ण आभूषणों से  सुसज्जित प्रतिष्ठित किए गए हैं; मूर्तियों को सजाने और विशेष पूजा-पाठ में  स्वर्ण का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है। मान्यताओं में सोना साक्षात लक...

धर्म-न्याय रक्षक परशुराम

Image
  परशुराम जयन्ती पर, धर्म-न्याय रक्षक परशुराम         @मानव हिंदू धर्म में छठे अवतार  भगवान परशुराम धर्म और न्याय के प्रतीक हैं; पिता महर्षि जमदग्नि और माँ रेणुका के ब्राह्मण कुल में जन्मे,  पर स्वभाव और कर्म से योद्धा  'ब्रह्म-क्षत्रिय' कहे जाते हैं।  शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण परशुरामजी के व्यक्तित्व में  ज्ञान और साहस के अद्भुत मिश्रण से भगवान शिव ने परशु प्रदान किया। परशुराम जी का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी से अधर्मी और अत्याचारी शासकों का नाश करना और धर्म की स्थापना था; जिससे समाज में न्याय और शाँति कायम हुई। परशुराम केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक महान शिक्षक भी थे, उन्होंने त्रेतायुग जिन योद्धाओं को  युद्ध और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी उनमें भीष्म,द्रोण कर्ण जैसे शिष्य  युद्ध कला में निपुण बने  और इतिहास में अमर हो गए। परशुराम जी चिरंजीवी हैं जो आज भी पृथ्वी पर रहते हैं और धर्म रक्षा के लिए प्रकट होते हैं, वे सात चिरंजीवियों में से एक हैं। उनकी अमरता और धर्म रक्षा की विशेषता  उन्हें अन्य अवतारों से  सर्वथा...

भगवान महावीर का संदेश

Image
  महावीर जयन्ती पर, भगवान महावीर का संदेश              @मानव अहिंसा, सिद्धांत  भगवान महावीर की एक गहन दार्शनिक चेतना है, जो बताता है कि हिंसा मात्र शारीरिक आघात नहीं,  बल्कि हर वह स्थिति है जहाँ किसी के अस्तित्व,सम्मान या जीवन-निर्वाह पर  प्रतिकूल प्रभाव पड़े।  भगवान महावीर ने सँसार में बढ़ती हिंसा,अन्याय एवं अमानवीयता को शाँत करने की दिशा में सोचा।  जब किन्हीं कारणों से  जीवन-यापन कठिन होता है, तब यह एक प्रकार की  'संरचनात्मक हिंसा' का रूप है जिसमें नीतियाँ और व्यवस्थाएं इस प्रकार काम करती हैं  कि वे समाज के एक वर्ग को निरंतर प्रभावित करती हैं। भले ही उसमें प्रत्यक्ष हिंसा न दिखे यह प्रभाव धीमा, किंतु गहरा होता है, जो समय के साथ असमानता और असँतोष को बढ़ाता है। महावीर का सँदेश सिखाता है कि अहिंसा निष्क्रियता नहीं, बल्कि सजग एवं साहसी हस्तक्षेप है; अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना और सँतुलन स्थापित करना ही सच्चा धर्म है। यह विचार केवल व्यक्तिगत आचरण तक सीमित न रहे, बल्कि नीतियों और शासन में भी दिखे, क्योंकि जब अन...