आत्मकल्याण की यात्रा
क्षमावाणी आत्मकल्याण की यात्रा @मानव 'मिच्छामि दुक्कड़म्।' यह न्यायालय में दिया गया माफीनामा नहीं है, न ही सामाजिक शिष्टाचार की औपचारिकता। यह एक स्वीकृति है कि मनुष्य अपूर्ण है और यही अपूर्णता उसे संवत्सरी के अवसर पर विनम्र बनाती है। क्षमा केवल दूसरों से माफी माँगना नहीं, अपने भीतर झाँकना भी है; एक प्राचीन उक्ति है- 'क्षमा, वीरस्य भूषणम्'। क्षमा का सर्वोच्च रूप तभी प्रकट होता है, जब प्रतिशोध-शक्ति होते हुए भी मनुष्य सँयम को चुनता है। यह स्वीकृति कमजोरी नहीं, समर्थ का उदाहरण है। पर्युषण महापर्व या दशलक्षण महापर्व जैन संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसके दोनों सिरों पर क्षमा उपस्थित है। एक 'उत्तम क्षमा' के रूप में दूसरी 'क्षमावाणी' के रूप में। यह पर्व हमारे जीवन में आत्मजागरण का मार्ग दिखाता है। पर्युषण-दशलक्षण पूर्ण होने के बाद क्षमा रूपी गुण को धारण करते हुए क्षमावाणी पर्व मनाया जाता है। अपनी आत्मा से तथा समस्त सृष्टि से क्षमा याचना की जाती है। क्षमावाणी पर्व में विश्वमैत्री की भावना स...