परिवर्तन
# जीवन_के_रङ्ग परिवर्तन @मानव खेतों के बीच की पगडण्डी से प्रातः भ्रमण के समय आज एक पौधा देख बरबस बचपन की याद आ गई और अपने को रोककर उसका चित्र लेने से ना रोक सका।सत्तर के दशक में यह पौधा हर पगडण्डी के बगल,खाली खेत,बंजर जमीन पर अपने आप उग आता था।कोमल मध्यम, नींबू के पत्ते के बराबर साइज के पत्ते वाले यह पौधे एक झाड़ी के रूप में बरसात में चार से पाँच फीट अधिकतम बढ़ते थे और अगस्त आने तक वे पीले फूलों से आच्छादित हो जाते थे।लोग इन्हें खर-पतवार मानकर आवश्यकता पड़ने पर उखड़ भी देते थे।हम बच्चे केवल फूल खेलने को तोड़ते थे।इस समय जगह-जगह आम की गुठलियाँ घूर पर उग चुकी होती थीं।तो उनकी कोपाल को तोड़कर मुलायम पड़ चुकी गुठली की छाल निकल कर पहले किसी साथी के व्याह की दिशा जुभली(गुठली के अन्दर के बीज से पूँछ कर चिढ़ाते।बाद में उसे बीच से फाड़ते,बीच में इसी पौधे की कोमल पत्तियाँ रखते दिन भर इसी से "पिपिहरी"(फूँक कर बजाने वाला वाद्य) बजाते।इस पौध के बीज मूँग की तरह दिखते पर आकार आधा और फलियाँ दो गुनी से भी लंबी होतीं।बरसात ब...