पितर-परिचर्या का पुण्य
पितृपक्ष पर, पितर-परिचर्या का पुण्य @मानव भारत की सनातन परंपरा देवताओं,ऋषियों और पितरों की पूजा का विधान करती है। पितृपक्ष में पितर पितृलोक छोड़कर पृथ्वी पर आ जाते हैं, यह पितरों की परिचर्या करने का अत्यंत प्रशस्त अवसर है। तर्पण एवं श्राद्ध से तृप्त पितर धन-धान्य,पुत्र-पौत्रदि का आशीर्वाद देकर पुनः स्वलोक चले जाते हैं। यह व्यवस्था भारत के अतिरिक्त कहीं भी नहीं है, इसलिए भारत को धर्मप्राण देश कहा जाता है। पितरों के आशीर्वाद से ही लौकिक समृद्धि एवं वंश परंपरा की निरंतरता बनी रहती है। भारतीय सनातन सँस्कृति में पितृपक्ष एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ जीवन-दर्शन है। यह वह दिव्य समय है जब हम अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, उन पूर्वजों को स्मरण करते हैं जिन्होंने हमें जीवन,सँस्कार,परंपरा और मूल्य दिए। श्राद्ध हमें वर्तमान और भविष्य का नहीं, बल्कि अतीत का भी सम्मान करने का सँदेश देता है। सँतानें अपने पितरों का ऋण चुकाने के लिए जन्मती हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध,तर्पण और पिंडदान से संतुष्ट पितर ...