नई सोच,सशक्त छवि
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर,
नई सोच,सशक्त छवि
@मानव
करुणा में डूबी नारी अस्मिता को
स्वर देते महिला दिवस का अवसर
मानवीय साहस
और सँवेदनशीलता की
सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में
प्रासंगिक है
जो स्त्री की अद्वितीय शक्ति का
वास्तविक उत्सव है।
भारतीय स्त्री
धैर्य,निष्ठा,सँकल्प
और जीवन को
उसकी समस्त जटिलताओं सहित
स्वीकार करने की
अद्भुत सामर्थ्य से दीप्त है।
यद्यपि वे भाग्य-चक्र,
सामाजिक व्यवस्था,
सत्ता-नियंत्रित निर्णयों
और पितृसत्तात्मक
मान्यताओं के अन्याय में
निरंतर आहत होती रहीं।
असाधारण स्त्रियों ने
उसकी कीमत
मौन वेदना,त्याग
और अनकहे संघर्ष से चुकाई,
उनके निरन्तर सँघर्ष ने
उनकी महिमा गाई गई।
पौराणिक स्त्री की अपेक्षा
आज की स्त्री जीवन में
नए अर्थ ग्रहण करती है;
यदि वही विडंबनाएं,परीक्षाएं
आज उनके सामने हों,
तो वे अपने अस्तित्व को
किस प्रकार पुनर्परिभाषित करेंगी?
आज की नायिकाएँ
जीवन को अपनी शर्तों पर
पुनः गढ़ती हैं;
उनके लिए पौराणिक जीवन
स्मरण भर नहीं,
प्रेरणा का स्रोत है,
जो उन्हें बार-बार
अपनी रिक्तता भरने,
नियति का वलय तोड़ने
और एक मुक्त,सँपूर्ण,
स्वनिर्मित जीवन का
स्वप्न देखने की शक्ति देता है।
मातृत्व की अनुत्तरित वेदना
जब आधुनिक जीवन की
कसौटी बन उठती है
यहीं पौराणिक
और समकालीन स्त्री
एकाकार होती है।
यह आधुनिक जीवन के
विविध आयामों को छूते हुए भी
बाहरी कोलाहल से दूर,
भीतर की प्रतिध्वनि को
सुनने का आमंत्रण देता है।
रिश्तों की ऊष्मा,
सामाजिक विरोधाभासों की कसक
और आत्मा की अनाम आकांक्षाएँ
एक सूक्ष्म,सौंदर्यपूर्ण
लय में गुंथी हैं।
स्मृति,सँवेदना
और आत्ममंथन की महीन तरंगें
साधारण जीवन-प्रसंगों को भी
गहरे दार्शनिक आलोक से
भरती हैं।
आज की नारी
हार मानने वाली नहीं है;
उसे अबला होने की छवि
कतई स्वीकार्य नहीं है।
बेटियों ने अपने बदले सोच से
पूर्वाग्रहों को तोड़ा है,
लोगों की धारणाएं बदली हैं;
हर चुनौती से पार पाना
उन्होंने सीख लिया है
और समय-समय पर इसे
प्रमाणित भी किया है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment