युग चेतना का पर्व

 वसंत पञ्चमी पर,

युग चेतना का पर्व


            @मानव

वसंत प्रकृति को

उसकी नींद से जगाता है;

पीले सरसों की गंध

जैसे हवा में घुल जाती है, 

वैसे ही वसंत पञ्चमी आते ही 

समय का रंग बदलने लगता है।


शीत के लंबे मौन के बाद 

धरती पहली बार

अपने भीतर की बात कहती है-

धीरे,संकोच से,

पर पूरी स्पष्टता के साथ। 


यह कोई घोषणा नहीं, 

बल्कि एक फुसफुसाहट है, 

जिसे केवल वही सुन पाता है,

जो मौसमों को केवल देखता नहीं,

उनको जीता है;

वसंत पञ्चमी इसी

फुसफुसाहट का नाम है।


कल्पना प्रधान कवियों की तरह

यह दिन प्रकृति को

केवल पृष्ठभूमि नहीं मानता, 

बल्कि मनुष्य के भीतर की 

सँवेदना का विस्तार बना देता है;

यहाँ भी बाहर का दृश्य 

भीतर की अनुभूति बन जाता है।


भारतीय दृष्टि में वसंत पञ्चमी

ज्ञान और सौंदर्य का

सँयुक्त उत्सव है, 

जबकि पश्चिमी चिंतन में

यह दिन 'बीइंग' से अधिक

'बीकमिंग' का उत्सव लगता है।


सरसों के फूल

किसी खेत में नहीं,

हमारी स्मृतियों में खिलते हैं; 

वसंत पञ्चमी इसीलिए

एक तिथि से अधिक

एक मनःस्थिति है।


वसंत पञ्चमी पर्व

ऋतु परिवर्तन के उत्सव के साथ

मानव अंतःकरण में 

सरस्वती तत्व के जागरण का

महापर्व है;

जो जीवन में नवसृजन,पवित्रता

व प्रज्ञा के अवतरवण का

सन्देश देता है।


माता सरस्वती विद्या की देवी हैं,

भारतीय ऋषि परंपरा में 

विद्या केवल जानकारी

या शास्त्रज्ञान नहीं है;

विद्या वह शक्ति है,

जो मनुष्य को विवेकशील, 

सँवेदनशील

और उत्तरदायी बनाती है।


इस दृष्टि से माता सरस्वती 

ज्ञान के साथ-साथ वाणी,विचार

और आचरण की शुद्धि की 

दिव्य प्रेरणा हैं।


वसंत ऋतु स्वयं

सरस्वती तत्व की प्रतीक है;

जैसे शीत की जड़ता टूटकर 

जीवन में नवचेतना का

सँचार होता है,

वैसे ही माँ सरस्वती की उपासना 

मनुष्य के भीतर से

अज्ञान,प्रमाद

और नकारात्मकता को हटाकर

प्रज्ञा का संचार करती है। 


पीले पुष्प,हरित खेत

और कोमल वातावरण 

हमें यह स्मरण कराते हैं

कि जीवन का मूल स्वभाव 

विकास और सौंदर्य है।


वर्तमान विज्ञान युग में

तकनीक और सूचना के बावजूद

समाज में असंतुलन,हिंसा 

और दिशाहीनता की वृद्धि का कारण

सँस्कारयुक्त विद्या का अभाव है।


'जिस शिक्षा से

मनुष्य श्रेष्ठ न बने,

वह वास्तविक शिक्षा नहीं है।' 

 (पं. श्रीराम शर्मा)

सरस्वती पूजन

और वसंत पञ्चमी

इसी विकृति के

समाधान का पर्व है,

जहाँ हम ज्ञान को चरित्र 

और सेवा से जोड़ने का

सँकल्प लेते हैं।


माता सरस्वती का 

प्रतीकात्मक स्वरूप

इस सँदेश को स्पष्ट करता है 

कि उनका श्वेत वस्त्र पवित्रता

और निष्कलंकता का प्रतीक है।


सच्चा ज्ञान

अहंकार से मुक्त होता है;

वीणा सँतुलन का सँकेतक है;

विचार और कर्म,

अध्ययन और आचरण का 

वस्तुनिष्ठ सँतुलन है

उनका वाहन हँस

विवेक का प्रतीक है, 

जिसमें सत्य और असत्य का 

भेद करने की क्षमता है।


'धियो यो नः प्रचोदयात्' 

     (गायत्री मंत्र से)

बुद्धि के परिष्कार की प्रार्थना है;

जब बुद्धि शुद्ध होती है, 

तभी सरस्वती का ज्ञान 

लोकमंगलकारी बनता है;

गायत्री बुद्धि को गढ़ती हैं 

और सरस्वती उसे 

आलोकित करती हैं।


आज का युवा वर्ग

युग परिवर्तन की धुरी है,

जो इस पर्व का केंद्रबिंदु है, 

यदि उसकी बुद्धि सँस्कारित हुई,

तो वही युवा समाज को

नई दिशा देगा।


सरस्वती पूजा और वसंत पञ्चमी

युवाओं को यह प्रेरणा देती है

कि वे केवल सफल नहीं, 

बल्कि सार्थक जीवन जिएं। 


जब माँ सरस्वती की उपासना

हर युवा की जीवन-शैली बनेगी, 

तभी ज्ञान, करुणा

और सेवा से युक्त समाज का

निर्माण सँभव हो सकेगा;

और युग चेतना का जागरण होगा।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments

Popular posts from this blog

नवरात्र साधना का सँदेश

पिता का त्याग

साधना का पर्व