साधना का पर्व
देवशयनी एकादशी पर,
साधना का पर्व
@मानव
भारतीय संस्कृति में
देवशयनी एकादशी
अति पवित्र और पुण्यदायी है
जो श्रीविष्णु की आराधना,
आत्मचिंतन
और साधना का
श्रेष्ठ अवसर प्रदान करती है।
यह समय समाजसेवा,
लोककल्याण
और आत्मशुद्धि की ओर
नवप्रेरणा का शुभारंभ भी है।
इसी दिन भगवान विष्णु
क्षीरसागर में योगनिद्रा में
प्रवेश करते हैं
और आगामी चार मासों तक
उसी स्थिति में रहते हैं।
यह चार महीनों की अवधि
चातुर्मास कहलाती है,
जिसमें व्रत,तप,संयम
और सत्कर्मों का
विशेष महत्व है।
योगनिद्रा का अर्थ सोना नहीं
बल्कि पूर्ण चेतना के साथ
विश्राम है
जो जागरण का हेतु बनता है।
इस कालखण्ड में
सूर्य व चंद्रमा के प्रभाव में
क्षीणता और ऋतुचक्र में
विश्राम की स्थिति दिखाई देती है।
वर्षा ऋतु में अग्नि तत्व की
गति मंद हो जाने से
जल की अधिकता
और सूर्यप्रकाश की न्यूनता से
शारीरिक ऊर्जा भी
प्रभावित होती है,
रोगजनक जीवाणु उत्पन्न होते हैं।
यह केवल एक धार्मिक तिथि नहीं,
अपितु सामाजिक चेतना को
जाग्रत करने का माध्यम भी है
जो आत्मसाधना,संयम
और लोकमंगल की भावना को
पुष्ट करने वाला होता है।
यह समय संयमित जीवनशैली,
शाकाहार और आत्मनिरीक्षण को
जीवन में अपनाने की
प्रेरणा देता है।
यह व्रत ईश्वर भक्ति,सेवा,
साधना और संयम
इन चार स्तंभों पर आधारित
जीवन को पुष्ट करता है।
देवशयनी एकादशी
भारतीय धर्म-संस्कृति की
उस गहराई को प्रकट करती है,
जहाँ ईश्वर के साथ
आत्मा का जुड़ाव
और समाज के प्रति उत्तरदायित्व
समान रूप से महत्व रखते हैं।
यह न केवल आध्यात्मिक
बल प्रदान करता है,
अपितु जीवन में सात्विकता
और आत्मबल की वृद्धि का भी
माध्यम बनता है।
श्रद्धा,सँयम
और साधना के साथ
हम अपने जीवन को
लोककल्याण,
आत्मविकास
और आध्यात्मिक उत्थान की
दिशा में ले जाएंगे।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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