पिता का त्याग
पिता का त्याग
@मानव
भारतीय सँस्कृति में पिता को
देवतुल्य माना गया है;
धरती पर पिता से बढ़कर
श्रेष्ठ मार्गदर्शक नहीं है।
पिता का सँघर्ष,अनुभव
और ज्ञान सँतान को
कठिन परिस्थितियों में
आगे बढ़ने की शक्ति
और ऊर्जा प्रदान करता है।
परिवार के प्रति
अपनी प्रतिबद्धता
और स्नेह को
पिता शब्दों से नहीं,
अपने कार्यों से प्रकट करता है।
वह जीवनभर सँघर्ष कर
अपनी सँतान के
सुनहरे भविष्य की
नींव रखता है।
पुत्र कितना भी निर्दयी हो जाए,
पिता उसके प्रति ममता
और प्रेम को नहीं त्यागता,
क्योंकि उसके लिए पिता ने
कितनी ही विपत्तियाँ झेली हैं।
(विष्णु पुराण)
पिता के हृदय में
पुत्र के लिए सदैव
ममता और प्रेम ही
अँकुरित होता है;
इसीलिए पिता का
विराट व्यक्तित्व
स्वर्ग से भी ऊँचा माना गया है।
पिता में सभी देवताओं का
निवास होता है,
इसलिए सँतान को हमेशा
पिता का सम्मान
और आदर करना चाहिए।
यज्ञोपवीत में से एक धागा
पितृ ऋण का प्रतीक है;
यह धागा सँतान को
अपने माता-पिता के प्रति
दायित्वों को बोध कराता है।
पिता अपने सँतान का
मार्गदर्शन करते हुए
उसके जीवन को
सुदृढ़ बनाता है।
पूरी दुनिया में
केवल पिता ही है,
जो अपनी संतान को
अपने से भी श्रेष्ठ
और सफल देखकर
प्रसन्न होता है।
पिता का योगदान,त्याग
उनका सँघर्ष और बलिदान
हमारे लिए अनमोल हैं;
जो हमें उनके प्रति सम्मान
और प्रेम प्रकट करने के लिए
सहज प्रेरित करते हैं,
अतः पितृदिवस की आवश्यकता
महज औपचारिकता है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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