वट वृक्ष की शरण

 वट सावित्री अमावस्या पर,

वट वृक्ष की शरण


            @मानव

पेड़-पौधे हमारी भावनाओं 

और सोच के प्रति

बहुत संवेदनशील होते हैं;

इनमें फिकस प्रजाति के पेड़

 (जैसे बरगद का पेड़)

अति संवेदनशील होते हैं;

भारत में उन्हें

ध्यान के लिए चुना जाता है; 

उनकी पूजा भी होती है।


वटवृक्ष के नीचे साधना

हमारे लिए एक माहौल 

तैयार कर देता है;

यह अपने-आप में

एक ध्यान कक्ष बन जाता है।


हमारे द्वारा उपजाई गई 

ऊर्जा के प्रति

ये पौधे बहुत ही

सँवेदनशील होते हैं;

क्योंकि ये पौधे

ध्यान परक विशेषता को

सँजोए रखते हैं।


जनश्रुति है कि

जब गौतम बुद्ध चलते थे

तो बहुत सारे पौधे

बेमौसम ही खिल उठते थे;

यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति

हो सकती है,

पर यह सच भी हो सकता है।


इस सँस्कृति में,

हजारों सालों से

पेड़ों को बचाने

और उन्हें जीवन 

व विवेक का रूप 

मानने की परंपरा रही है। 


पेड़ों को ऊँचा मानकर

उनसे कुछ ज्ञान

प्राप्त करने की परंपरा 

हमेशा रही है।


यदि हम अपनी पूरी समझ 

और जागरूकता के साथ खिलेंगे

और अपने आसपास के 

पर्यावरण से जुडेंगे,

तब हमें पता चलेगा

कि हम और पर्यावरण

अलग-अलग नहीं हैं।


जब हम साँस छोड़ रहे हैं

तो पौधे उसे ले रहे हैं;

पौधे जो साँस छोड़ रहे हैं, 

उसे हम ले रहे हैं;

केवल आधा श्वसन तंत्र ही

हमारी छाती में है;

बाकी आधा तो

पेड़ पर लटक रहा है।


अगर हमने उस आधे को 

नहीं सँभाला

तो बाकी आधे का वजूद भी 

खतरे में आ जाएगा।


पारिस्थितिकी हमारा जीवन है,

यदि हम आध्यात्मिक रूप से

जाग्रत हैं,

तो हर वस्तु में जीवन है;

तब पर्यावरण की रक्षा

हमारा धर्म बन जाता है।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

(सद्गुरु विचार शृंखला से)

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