आत्मकल्याण पथ प्रदर्शक
स्वामी दयानंद जन्मजयंती
आत्मकल्याण पथ प्रदर्शक
@मानव
वेदों की भाषा में
मनुष्य का अँतिम लक्ष्य
मोक्ष निर्धारित करने वाले
स्वामी दयानंद जी ने
वेदों की ओर लौटने के लिए
लोगों का आह्वान किया।
इसका अभिप्राय
भारत की आध्यात्मिक परंपरा से
जुड़ जाना है;
ब्रह्मविद्या प्राप्ति के लिए
स्वयं को प्रस्तुत करना है;
क्योंकि ब्रह्म विद्या ही व्यक्ति को
मोक्ष की ओर ले जाती है।
अतः "उठो, जागो
और तब तक रुको नहीं
जब तक कि लक्ष्य की
प्राप्ति न हो जाए।"
"उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान्निबोधयत"
(कठोपनिषद)
उनका श्रेय वाक्य रहा।
ब्रह्म की रहस्य भरी विद्या के
विवेचन से परिपूर्ण
उपनिषदों के साथ तादात्म्य से
हमें विवेक और वैराग्य की
ओर ले जाती है।
उपनिषद जीवन का
वास्तविक रहस्य
अपने आप को जानना है;
जिसे जानकर ही
अपने लक्ष्य की ओर
गति करना है
और जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो,
तब तक निरंतर आगे
बढ़ते रहना है।
यमराज ने नचिकेता को
मनुष्य जीवन के दो मार्गों
श्रेय और प्रेय मार्ग का
बोध कराया था
जिसमें हमें श्रेय मार्ग का
पथिक होना श्रेयस्कर है
जो आत्मकल्याण का मार्ग है;
इसी मार्ग को अपना कर हम मोक्ष अभिलाषी बनें।
मोक्षाभिलाषी बनकर मनुष्य
यदि जीवन जीने की
तैयारी कर लेता है
तो समझो वह मरने की
तैयारी कर लेता है
जिसका अभिप्राय है
कि मृत्यु की भी मृत्यु कर दी जाए
अर्थात आवागमन के चक्र से
छूटकर मोक्ष पद
प्राप्त कर लिया जाए।
मोक्ष अभिलाषी
होने का अभिप्राय है
योग मार्ग को अपना लेना;
सँसार के पांच क्लेशों
अविद्या,अस्मिता,राग,द्वेष
और अभिनिवेश को जीत लेना;
काम,क्रोध,मद,मोह,
लोभ को जीत लेना;
चित्त वृत्तियों का निरोध है।
एषणाओं,क्लेशों
या विकारों को मारा नहीं जाता,
अपितु बहुत प्यार से
इन पर जीत प्राप्त की जाती है।
"मैं उस प्रभु को जानूँ,
जो सबसे महान् है।
जो करोड़ों सूर्यों के समान
दैदीप्यमान है।
जिसमें अविद्या और अँधकार का
लेश भी नहीं है।
उसी परमात्मा को जानकर
मनुष्य दुखों से,
सँसार रूपी मृत्यु-सागर से
पार उतरता है,
मोक्ष-प्राप्ति का
और कोई उपाय नहीं है।"
वेदाहमेतं पुरुषं
महान्तमादित्यवर्णं
तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति
मृत्युमेति नान्यः पन्था
विद्यतेऽयनाय।।
(यजु० ३१/१८)
आलोक-
निरोध का अभिप्राय विरोध नहीं,
अपितु पुचकार कर उन्हें
प्यार से अपने अधीन कर लेना है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment