अँतस का वसंत

 अँतस का वसंत


              @मानव

वसंत प्रकृति के

परम सौंदर्य का प्रतीक है;

इस अवसर पर चारों ओर 

प्रकृति में एक अद्भुत ऊर्जा 

एवं नवीनीकरण की प्रक्रिया 

प्रारंभ हो जाती है।


शीत के प्रभाव से आई

वनस्पतियों में स्थिरता को

वसंत का यह स्वर्णिम काल 

उसे प्राकृतिक स्थिरता में 

गति तथा नवीन ऊर्जा का 

सँचार करता है,

जिससे वातावरण में मधुरता का

सँचार हो जाता है।


शास्त्रों में इसे 

मधु मास कहा गया है

जो प्रकृति को

उसकी नींद से जगाता है।


केवल बाहर के वसंत को 

निहारने मात्र से

जीवन परिवर्तित नहीं होता; 

प्रकृति के इस परम वैभव को

भीतर उतारना भी

हमारी प्राथमिकता हो।


जिस क्षण हम अपने

अंतस के आनंद के विषय में 

चिंतन करके पुरुषार्थी बनते हैं,

उसी समय हमारे भीतर भी 

अद्भुत परिवर्तन

दृष्टिगोचर होने लगता है। 


वसंत में बाहर की प्रकृति 

अपने सौंदर्य के

परम वैभव पर होती है;

प्रकृति के इस

सुरम्य वातावरण का प्रभाव 

हमारे भीतर भी

दिखना चाहिए।


हमारे अंतस में विद्यमान 

अज्ञान,निराशा,जड़ता, 

आसुरी प्रवृत्तियाँ, 

पुरुषार्थहीनता

हमारी आध्यात्मिक उन्नति में

बाधा उत्पन्न करते हैं, 

जिससे जीवन में सदैव 

अशांति और चिंता ही

दिखाई देती है।


इसे दूर करने के लिए 

आध्यात्मिक एवं बौद्धिक 

उत्कर्ष रूपी वसंत

हमारे अंतस में भी

घटित होना आवश्यक है। 


ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी 

परम चेतना सरस्वती के 

आविर्भाव को समर्पित है

वसंत पंचमी का अवसर

हमें बौद्धिक रूप से

सजग बनने की

प्रेरणा प्रदान करता है।


जब हमारे भीतर

मानस पटल पर भी 

आध्यात्मिक शक्तियों का 

जागरण होता है

तो हमारे भीतर भी

वैसा ही आनंदमय 

वातावरण सृजित होता है

जो बाहर है।


यह अवसर हमें

अपने अंतस से जोड़ता है, 

जिससे बौद्धिक उत्थान की ओर

मनुष्य बढ़ता है;

हम भीतर से आनंदित

एवं ऊर्जावान बनते हैं।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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