Posts

Showing posts from February, 2026

शिवत्व की अनुभूति

Image
  शिवरात्रि पर्व पर, शिवत्व की अनुभूति              @मानव जीवन में शिवत्व की  अनुभूति का पर्व है महाशिवरात्रि! शिव और शक्ति के मिलन का दिव्य उत्सव है यह पर्व! जो पुरुष और स्त्री ऊर्जा चेतना और सृजनात्मक शक्ति के मिलन के प्रतीक का अवसर है। शिव का अर्थ मङ्गलकारी  और अतिशय कल्याणकारी है; इसलिए शिवत्व का मार्ग  आत्म-कल्याण का मार्ग है।  आध्यात्मिक साधक योगी  और उपासक समस्त सृष्टि का स्रोत इसी पर्व को मानते हैं। भगवान शिव आदियोगी हैं;  शिवरात्रि का यह अवसर  आँतरिक योग साधना उपासकों के लिए विशेष लाभकारी है। सृष्टि के कण-कण में विद्यमान शिव तत्व की अनुभूति हेतु  साधकों के लिए यह रात्रि  अंतस को ध्यान की अवस्था में केंद्रित करने का दिव्य अवसर है। यह भगवान शिव के  त्यागमय,ज्ञान,वैराग्य,  करुणा से परिपूर्ण  साधनानिष्ठ जीवन के  आत्म-कल्याणकारी आदर्श का अनुकरण करने का पर्व है।  इस अवसर की समस्त धार्मिक क्रियाओं एवं उत्सवों में आँतरिक उत्थान एवं प्रकृति के प्रत्येक तत्व के कल्याण का सँदेश नि...

आत्मकल्याण पथ प्रदर्शक

Image
  स्वामी दयानंद जन्मजयंती आत्मकल्याण पथ प्रदर्शक              @मानव वेदों की भाषा में मनुष्य का अँतिम लक्ष्य  मोक्ष निर्धारित करने वाले स्वामी दयानंद जी ने वेदों की ओर लौटने के लिए  लोगों का आह्वान किया। इसका अभिप्राय भारत की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ जाना है; ब्रह्मविद्या प्राप्ति के लिए  स्वयं को प्रस्तुत करना है; क्योंकि ब्रह्म विद्या ही व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाती है। अतः "उठो, जागो और तब तक रुको नहीं  जब तक कि लक्ष्य की  प्राप्ति न हो जाए।" "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधयत"       (कठोपनिषद) उनका श्रेय वाक्य रहा। ब्रह्म की रहस्य भरी विद्या के विवेचन से परिपूर्ण  उपनिषदों के साथ तादात्म्य से हमें विवेक और वैराग्य की  ओर ले जाती है। उपनिषद जीवन का  वास्तविक रहस्य अपने आप को जानना है;  जिसे जानकर ही अपने लक्ष्य की ओर गति करना है और जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो, तब तक निरंतर आगे बढ़ते रहना है। यमराज ने नचिकेता को  मनुष्य जीवन के दो मार्गों  श्रेय और प्रेय मार्ग का बोध कराय...

अँतस का वसंत

Image
  अँतस का वसंत               @मानव वसंत प्रकृति के परम सौंदर्य का प्रतीक है; इस अवसर पर चारों ओर  प्रकृति में एक अद्भुत ऊर्जा  एवं नवीनीकरण की प्रक्रिया  प्रारंभ हो जाती है। शीत के प्रभाव से आई वनस्पतियों में स्थिरता को वसंत का यह स्वर्णिम काल  उसे प्राकृतिक स्थिरता में  गति तथा नवीन ऊर्जा का  सँचार करता है, जिससे वातावरण में मधुरता का सँचार हो जाता है। शास्त्रों में इसे  मधु मास कहा गया है जो प्रकृति को उसकी नींद से जगाता है। केवल बाहर के वसंत को  निहारने मात्र से जीवन परिवर्तित नहीं होता;  प्रकृति के इस परम वैभव को भीतर उतारना भी हमारी प्राथमिकता हो। जिस क्षण हम अपने अंतस के आनंद के विषय में  चिंतन करके पुरुषार्थी बनते हैं, उसी समय हमारे भीतर भी  अद्भुत परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगता है।  वसंत में बाहर की प्रकृति  अपने सौंदर्य के परम वैभव पर होती है; प्रकृति के इस सुरम्य वातावरण का प्रभाव  हमारे भीतर भी दिखना चाहिए। हमारे अंतस में विद्यमान  अज्ञान,निराशा,जड़ता,  आसुरी...