तमसो मा ज्योतिर्गमय
देव दीपावली पर, तमसो मा ज्योतिर्गमय @मानव शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा । शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥ जो शुभ,कल्याण,आरोग्य और धन सम्पत्ति प्रदान करे तथा शत्रु बुद्धि का नाश करे, उस दीपज्योति को नमस्कार है। भारत की साँस्कृतिक परंपराएँ केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के उच्चतम आदर्शों की अभिव्यक्ति हैं; इन्हीं में से एक है देव दीपावली। दीपों की झिलमिलाहट के बीच गूँजती गङ्गा आरती की स्वर लहरियाँ केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अध्यात्म,सँस्कृति और विज्ञान का समन्वित रूप अनुभव कराती है। देव दीपावली का मूल भाव है ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' जब सँपूर्ण काशी दीपमालाओं से आलोकित होती है, तो यह केवल बाहरी प्रकाश नहीं, बल्कि अंतर्मन की जागृति का प्रतीक होती है। प्रत्येक दीपक हमें सिखाता है कि जैसे वह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, वैसे ही मनुष्य को भी अपने भीतर के अहंकार और नकारात्मकता को जलाकर समाज में प्रेम,ज्ञान और सद्भावना का आलोक फैलाना होगा। त्रिपुरासुर ...