जगत-जागरण पर्व
प्रबोधिनी एकादशी पर,
जगत-जागरण पर्व
@मानव
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद
त्यज निद्रां जगत्पते।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ
जगत सुप्तं भवेदिदम्।
उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।
गता मेघा वियच्चैव
निर्मलं निर्मलादिशः।
शारदानि च पुष्पाणि
गृहाण मम केशव।।
भगवान के जागरण के साथ-साथ
पूरे जगत के जागरण का
पर्व है यह!
जिसमें जगत को
भगवान सँदेश देते हैं
कि अकर्मण्यता की रात्रि
व्यतीत हो चुकी है
और कर्म के सूर्य का
उदय होना है।
हमें अपने कर्तव्यों के प्रति भी
जाग्रत होना होगा।
जगत के पालनहार
भगवान विष्णु की
चार माास की निद्रा के बाद
उनका जागरण
पूरे जगत को
अपने कर्तव्यों के प्रति
जाग्रत होने का सँदेश देता है।
भक्तों की भावना के अनुसार,
जब विष्णुरूपी सूर्य
वर्षाकाल में बादलों से ढक जाते हैं
और जब तक मेघों से मुक्त नहीं होते,
तब तक चार महीनों का समय
भगवान का शयनकाल है।
यही चातुर्मास्य व्रत भी है।
अपने भीतर के देवत्व को
जगाने का भी समय यही है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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