तमसो मा ज्योतिर्गमय

 देव दीपावली पर,


तमसो मा ज्योतिर्गमय

               @मानव

शुभं करोतु कल्याणं

आरोग्यं धनसंपदा । 

शत्रुबुद्धिविनाशाय 

दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥


जो शुभ,कल्याण,आरोग्य 

और धन सम्पत्ति प्रदान करे 

तथा शत्रु बुद्धि का नाश करे,

उस दीपज्योति को नमस्कार है।


भारत की साँस्कृतिक परंपराएँ

केवल उत्सव नहीं,

बल्कि जीवन के

उच्चतम आदर्शों की

अभिव्यक्ति हैं;

इन्हीं में से एक है

देव दीपावली।


दीपों की झिलमिलाहट के बीच

गूँजती गङ्गा आरती की

स्वर लहरियाँ

केवल धार्मिक उत्सव नहीं, 

बल्कि अध्यात्म,सँस्कृति 

और विज्ञान का समन्वित रूप

अनुभव कराती है।


देव दीपावली का मूल भाव है

'तमसो मा ज्योतिर्गमय'

जब सँपूर्ण काशी 

दीपमालाओं से आलोकित होती है,

तो यह केवल बाहरी प्रकाश नहीं,

बल्कि अंतर्मन की जागृति का

प्रतीक होती है।


प्रत्येक दीपक हमें सिखाता है

कि जैसे वह स्वयं जलकर 

दूसरों को प्रकाश देता है, 

वैसे ही मनुष्य को भी

अपने भीतर के अहंकार

और नकारात्मकता को जलाकर

समाज में प्रेम,ज्ञान

और सद्भावना का आलोक 

फैलाना होगा।


त्रिपुरासुर वध के उपलक्ष्य में 

देवताओं ने भगवान शिव के प्रति

कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु 

काशी में दीप प्रज्वलित किया था;

अंतः यह त्रिपुरारी पूर्णिमा भी है।


गङ्गा आरती का दृश्य

केवल दृश्य सौंदर्य नहीं, 

बल्कि भक्ति की गहराई का 

अनुभव कराता है;

कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान 

सौ यज्ञों के समान

पुण्य फलदायी होता है।


वाराणसी के घाटों पर

जब हजारों दीप एक साथ 

प्रज्वलित होते हैं,

तो सामूहिक ऊर्जा का 

सृजन होता है।


यह सामूहिकता

मानव मन में एकता,प्रेम 

और सह-अस्तित्व की 

भावना को प्रबल बनाती है। 


देव दीपावली का दृश्य 

मानवता के वैश्विक संदेश 

"सर्वे भवंतु सुखिनः" को 

साकार करता है।


देव दीपावली का सँदेश है

'प्रकाश' फैलाइए,

प्रेम जगाइए

और प्रकृति से जुड़िए।'

यह पर्व मन के अँधकार को 

मिटाने का है।


जब घाटों पर दीपों की 

अनगिनत कतारें

गङ्गा जल में

प्रतिबिंबित होती हैं,

तब प्रतीत होता है

कि धरती व आकाश दोनों

मानो दीपों के प्रकाश में 

स्नान कर रहे हों।


यही वह क्षण है,

जब धर्म,अध्यात्म

और विज्ञान एक साथ 

अनुभव किए जा सकते हैं 

एक ऐसी दिव्यता में,

जो सबको जोड़ती है, 

सबको आलोकित करती है।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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