कानून वापसी के राजनीतिक निहितार्थ

 कानून वापसी के राजनीतिक निहितार्थ 


- मोदी के वोटर मोदी को दृढ़ संकल्पित व्यक्ति के रूप में मानते रहे अतः वह कतई कानून वापसी के पक्ष में नहीं थे,जबकि कानून वापसी की माँग करने वाले उनके वोटर कभी नहीं थे इसलिए मोदी ने अपने समर्थकों का भरोसा डगमगा दिया है।वे उनको कैसे विश्वास दिला पाएँगे यह तो समय ही बताएगा।


-कानून वापसी की मांग की आड़ में उपद्रवी तत्व, विदेशी ताकतें और उनके घरेलू दलाल जिस तरह से देश तोड़ने की साजिशें रच रहे थे,लोगों को भड़का रहे थे उस पर रोक लग गई है।


-एक अनुमान तो यह भी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सरकार की चिंता बढ़ रही थी। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह प्रदर्शनकारियों के बीच खालिस्तानी और पाकिस्तानी तत्वों की बढ़ती पैठ को लेकर लगातार आगाह करते रहे थे उनका मानना था कि पंजाब में तीन दशक पहले जैसी अशांति एवं अस्थिरता का खतरा बढ़ रहा था।


-यह रोचक है कि भारत के अंदर नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों के कटु आलोचक रहे अर्थशास्त्रियों ने भले कोई सवाल नहीं उठाए पर स्थानीय राजनीति से प्रभावित कनाडा के पीएम जस्टिन टुडो और ब्रिटेन व अमेरिका के कुछ सांसदों ने भारत में लागू इस कानून पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे दीं।पॉप सिंगर रिहाना व पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने तथाकथित टूल किट का हिस्सा बनकर शोहरत बटोरी। मार्च 2021 में तो ब्रिटिश सांसदों ने उक्त कानूनों पर बहस का फैसला ले लिया।अंततः इस असहज स्थिति में विदेश मंत्रालय के कूटनीतिक कदमों से इन पर रोक लगाकर स्थिति को काबू में लाया जा सका।


-किसान आंदोलन के कारण पंजाब में भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए लगा लॉकडाउन अब खुलने की आशा बन्ध गई है।


-कुछ लोग इस फैसले की व्याख्या राजनीतिक दबाव के रूप में कर रहे हैं जबकि कुछ लोग इसे किसान आंदोलन की आग में रोटी सेकने वाले राजनीतिक दलों से मुद्दा छीन लेने वाला मास्टर स्ट्रोक मान रहे हैं।उदाहरण के लिए वे इसे ऐसी गुगली सिद्ध कर रहे हैं जिससे विपक्ष दिग्भ्रम की स्थिति में है।कानून वापसी के दिन,19 नवंबर को इंदिरा गांधी जयन्ती होते हुए भी सभी अनुयायी व मीडिया अपने शीर्ष नेता को खुलकर श्रद्धांजलि भी नहीं दे सका वह केवल मोदी के निर्णय के निहितार्थ ही निकालता रह गया। 


-असीम आस्था रखने वाले तो कृषि कानूनों की वापसी के कदम को शिकार के समय शेर के द्वारा कदम पीछे हटाने वाला स्टेप के रुप में व्याख्यायित कर रहे हैं।


तीन कृषि कानूनों की अभूतपूर्व वापसी का निर्णय अपने पीछे अटकलों का बाजार गर्म कर गया इसके विभिन्न राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं इन्हीं निहितार्थों में अपनी- अपनी राजनीतिक मान्यताएं भी शामिल हैं। इसका नफा-नुकसान तो बाद में पता चलेगा साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि वे भाजपा के तारणहार हैं या गर्त्य में धकेलने वाले;पर यह विचारणीय अवश्य है।


मनोज श्रीवास्तव

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