धन त्रयोदशी

 धन त्रयोदशी



       @मानव

धनतेरस पर्व के दिन

हम यह मानें 

कि हम जो चाहते हैं,

वह धन हमारे पास है।


ज्ञान भी धन है,

यह सबसे बड़ा धन है;

अपने ज्ञान को संजोना 

प्रचुरता का अनुभव करना 

जीवन में स्वयं को

धन्यभागी अनुभव करना, 

कृतज्ञता का अनुभव करना

सबसे बड़ा धन है।


स्वास्थ्य भी धन है;

स्वास्थ्य बिना भौतिक धन 

अनुपयोगी हो सकता है,

देवताओं के वैद्य

धन्वंतरि की जयंती

धन त्रयोदशी को ही है,

वे समुद्र मंथन में

अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।


अत: धन त्रयोदशी पर 

धन्वंतरि का ध्यान कर 

अपने स्वास्थ्य के प्रति 

सचेष्ट रहने की प्रेरणा मिलती है;

क्योंकि मानव शरीर भी 

ईश्वर प्रदत्त बड़ा उपहार है,

यह भी धन है।


हमारी चेतना में  गुण है

कि जो बीज बोते हैं,

वही प्रकट होता है;

यदि हम स्वीकार करें

कि मेरे पास पर्याप्त धन है, 

तब हम धन के पीछे

पागल नहीं होते;

इससे चेतना में धैर्य आता है,

हिम्मत आती है।


कहा गया है,

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः,

अर्थात,जो मेहनत करता है

और शेर जैसा निर्भय चलता है,

लक्ष्मी भी उसी के पास आती हैं;

अतः ‘अभाव के भाव’ को

चेतना से उखाड़ फेंकना 

धनतेरस का प्रयोजन है।


अपनी स्थिति को स्वीकार करने

और उसकी बेहतरी हेतु 

कर्म करने के लिए

धन त्रयोदशी पर्व

हमें प्रेरित करता है;

धनतेरस कृतज्ञता

और तृप्ति अनुभव का दिन है।


अपने घर में जो भी चीजें हैं,

वे सब सामने रखकर

भरपूर होने का

जो अनुभव करते हैं 

उससे अभाव मिट जाता है;

भीतर का लोभ मिट जाता है।


जब लोभ और अभाव मिट जाएँ,

तृप्ति झलकने लगे,

तभी भीतर का दीया

प्रज्ज्वलित होगा

और अंधेरा मिटेगा;

यह अंधेरा मिटाने के लिए 

हमें ज्ञान का दीया जलाना चाहिए;

ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है 

हमारे पास जो कुछ भी है, 

उसके लिए ईश्वर के प्रति 

कृतज्ञता का अनुभव करना चाहिए।


✍️मनोज श्रीवास्तव

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