पितरों की शाँति

 पितरों की शाँति


          @मानव

पिण्ड और प्राण का संयोग 

किसी विशेष लक्ष्य के लिए है;

ज्यों ही कर्तव्य पूर्ण हो जाता है,

पिण्ड एवं प्राण का वियोग निश्चित है।


शरीर सदा विनाशी है

और आत्मा का कभी भी 

विनाश संभव नहीं।

     (सांख्य योग)

जिनके प्राण चले गए हों, 

उनके लिए विद्वान

शोक नहीं करते।

  (श्रीमद्भागवतगीता)


देह से ही सारे संबंध होते हैं, 

देह द्वारा मृदा को

अंगीकार कर लेने के उपरांत 

प्राण स्वतंत्र हो जाता है;

अन्य किसी देह से

उसका संबंध नहीं रहता, 

वह मुक्त है।


ममता एवं आसक्ति

जितनी सृजनात्मक है 

उतनी ही घातक भी;

माता-पिता मोहवश

संतान का भरण-पोषण करते हैं;

संतान भी माता-पिता से प्रेम करती है,

और उनकी सेवा करती है;

पति-पत्नी आत्मिक प्रेम के कारण

एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं;

मित्र आदि संबंध भी

मोह के धागों से ही जुड़े हैं;

वियोग की दशा में

यही ममता एवं आसक्ति 

निराशा के अंधकार में

हमें डुबो सकती है।


"जो शरीर जन्म लेते ही

हर क्षण परिवर्तित हो रहा है,

जो एक क्षण भी स्थायी नहीं है,

उसके लिए शोक करना 

सर्वथा उचित नहीं है।


मृत आत्मा को श्रद्धांजलि देना,

उनकी सद्गति के लिए प्रार्थना करना,

उनकी अपूर्ण इच्छा पूर्ण करने का

यथासंभव प्रयास उचित है। 


प्रिय के चले जाने से

शोक अचानक कम नहीं होता;

उसकी भावनात्मक क्षतिपूर्ति में

समय लगता है,

परंतु विचार एवं ज्ञान

एक ऐसी शक्ति है,

जो वस्तुस्थिति भले ही न बदल सके,

उससे लड़ने की,

उसे आत्मसात करने की शक्ति

अवश्य प्रदान करती है।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

Comments

  1. बहुत सुंदर लिखा है। सराहनीय

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