विजयदशमी

 विजयदशमी


        @मानव

मानसिकता से रावण को

अर्थात रावण की बुराइयों को 

मारने का प्रण ही 

विजयदशमी है।


रावण की अच्छाइयाँ हैं

कि वह बलवान है,

जो शंभू सहित

कैलाश उठा सकता है;

कोई बलवान

यदि बुद्धिमान न हो

तो बल संघर्ष करता है। 

जबकि रावण बुद्धिमान भी है।


रावण विद्यावान भी है

रावण तपवान भी है,

और धनवान भी बहुत है;

धनवान होने के साथ 

धर्मवान होना चाहिए;

जो रावण से अछूता है।


अच्छाइयों के अतिरिक्त

उसमें कमजोरियाँ भी हैं

वह शीलहीन है,;

रावण नीति का दावा तो करता है,

पर नीतिवान है नहीं।


रावण धर्मवान भी नहीं है

भक्तिवान भी नहीं है;

और रूपवान भी नहीं है;

सीमा से बाहर जाकर

रूप पर रीझना,

उस पर आक्रमण कर देना 

रावण की कमजोरी है;

रूप पर आक्रमण तो

अरूप ही करता है;

रूप तो रूप की पूजा करता है।


विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को

गुण-दोषमय रचा है,

किन्तु संत रूपी हंस

दोष रूपी जल को छोड़कर 

गुण रूपी दूध को ही

ग्रहण करते हैं।

'जड़ चेतन गुन दोषमय 

बिस्व कीन्ह करतार।

संत हंस गुन गहहिं पय 

परिहरि बारि बिकार।।''

  (रामचरित मानस)


रावण ऐसा नहीं कर सका; 

रावण को कहीं रोग

तो कहीं मोह कहा गया है;

रावण रूपी रोग

और मोह से पार पाने का दिन ही

विजयदशमी है।


हम शीलवान बनें;

हम नीति,धर्म

और भक्ति के रास्ते पर चलें; 

यही रोग और मोह रूपी रावण का

मानसिक वध कर 

विजयदशमी पर्व मनाना है। 


जहाँ भी पाप दिखे,

उपेक्षा करो

पापी की नहीं,

उसके पाप की उपेक्षा करो।

  (महर्षि पतंजलि)

इसी प्रकार हमें

असुरों का नहीं,

आसुरी तत्वों का हनन करना है,

अंदर की बुराइयों को मारना है;

इसी में विश्व की प्रसन्नता है।


विजयदशमी पर्व

मनाने की सार्थकता तभी है, 

जब हम अंदर की 

कमजोरियों को नष्ट करें;

यदि कम से कम हम मान लें 

कि हममें यह कमी है

तो कभी न कभी

वह दूर भी की जा सकती है।


हमारा विजयदशमी पर्व 

तभी संपूर्ण होगा,

जब हम सबके सुखी रहने की,

स्वस्थ रहने की,

सब के शतायु होने की कामना करें

और उस तरह के प्रयास भी करें।


हमारे वेद कहते हैं-

सर्वे भवंतु सुखिन:,

सर्वे संतु निरामया:।

सब सुखी हों,

सब निरोगी हों,

सब शतायु हो।

रामराज के मूल में भी

यही भावना निहित है।


दूसरों के कल्याण की 

भारतीय सोच

पूरे विश्व के कल्याण की सोच है;

यही राम राज की सोच है। 


राम ने रावण से युद्ध को 

रोकने के उपाय किए?

युद्ध पूर्व सेतु बनाया,

पहले जोड़ो

पहले एक्य

यह भूमि एकता की है,

पहले जोड़ा जाए

फिर यदि संघर्ष करना पड़े 

तो किया जाए;

यह भारत का विचार है।


विजयदशमी का पर्व

सिर्फ रावण के वध

और राम की विजय का

पर्व नहीं है,

इसके मूल में

सेतुबंध के प्रयास का संदेश भी है।


जिसमें भी राम तत्व होगा, 

वो सिर्फ जोड़ने की बात करेगा,

सत्य, प्रेम और करुणा 

प्रमुख राम तत्व हैं।


जिसमें ये तत्व होंगे,

वो वंचितों तक पहुँचेंगे;

गुह,शबरी,अहिल्या के संग

राम स्वयं इसके आदर्श हैं

यदि हम भी ऐसा कर सके

तो समझें

कि विजयदशमी मनाने की राह पर

हम अग्रसर हो चुके हैं।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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