अचल होऊ अहिवातु तुम्हारा

 अचल होऊ अहिवातु तुम्हारा

           @मानव

त्योहार समाज के प्राण हैं 

और ये हम सबके जीवन में 

आनंद और ऊर्जा

भरने का काम करते हैं।


हमारी परंपरानुशील संस्कृति,

पर्व,व्रत,त्योहार से 

ऊर्जा लेती हुई

नित्य नवीन हो

बढ़ती चलती है।


संस्कृति के इस निर्मल प्रवाह की

रक्षिकाएं और पोषिकाएं 

हमारी मातृशक्ति है,

सभी पर्वों के मूल में

परिवार की कुशलता की 

आकांक्षा प्रबल होती है; 

इनमें सौभाग्य एवं मातृत्व के

व्रत-त्योहारों के प्रति

स्त्रियों का विशिष्ट उमंग होता है।


चंद्रमा मनसो जातः अर्थात् 

विराट् पुरुष के मन से

चंद्रमा का प्राकट्य हुआ है

अतः चंद्रमा मन का प्रतीक है,

प्रेम का प्रतीक है;

चंद्रमा लालित्य है,

मन की प्रसन्नता है

और इंद्रियों के लिए प्रकाश है।


चंद्रमा एकांत का साथी है, 

जो हर रात आकाश में

दिव्य आभा के साथ बैठता है;

बढ़ती-घटती कलाओं के साथ

प्रतिनिशा मुस्कुराता है। 


पूर्णिमा के चंद्र का सौंदर्य

कवि साहित्यकार को

भले आकर्षित करता हो

पर विवाहिता के लिए  

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का 

चंद्रमा का दर्शन

सबसे सुंदर अनुभूति है।


चंद्र षोडश कलाओं का स्वामी है,

यह चंद्रमा की प्रेरणा ही है,

जो इस दिन स्त्रियाँ

सोलह श्रृंगार कर

अपने सौभाग्य का

शगुन मनाती हैं।


सौभाग्यवती स्त्रियाँ

पति की दीर्घायु

एवं अखंड सौभाग्य के लिए 

दिन भर निर्जल व्रत रखकर 

रात में चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं;

चंद्रमा के दर्शन, 

विधिविधान से पूजन-अर्चन 

करके ही

भोजन ग्रहण करती हैं;

यहाँ भाव प्रेम

और समर्पण का है


करवाचौथ उमंग का पर्व है 

और इसकी मूल प्रेरणा प्रकृति है;

चंद्रमा एक विश्वसनीय साथी है;

वह हमारा साथ कभी नहीं छोड़ता;

वह जहाँ रहता है,

हमें वहाँ से देखता रहता है;

वह हमारे एकांत को, 

दुख-सुख को,

उजले और अंधेरे

पलों को जानता है।


अपनी कलाओं में 

घटता-बढ़ता चंद्रमा

हर दिन अलग रूप लेता है;

कभी क्षीण और मलिन, 

कभी पूर्णता से लबालब 

रोशनी से भरा हुआ।


चंद्रमा से अधिक

इंसान की कमियाँ,कमजोरियाँ

और एकाकीपन

कौन समझ सकता है;

वह समझता है

कि हर किसी में थोड़ा सा 

सूर्य और चंद्रमा होता है;

अंधकार और प्रकाश होता है।


चंद्रमा नियम से

अपने मार्ग पर चलता रहता है,

लेकिन अपने स्वभाव के कारण

यह धीरे-धीरे प्रभाव डालता है;

यही वह पिंड है

जो पूरे महासागर को

किनारे तक खींच सकता है, 

चंद्रमा अपने शांत स्वरूप में भी

अत्यंत समर्थशाली है।


चंद्रमा को पूजकर

सौभाग्य की आश्वस्ति

अटूट विश्वास का प्रण है, 

प्रकृति की सत्ता को 

स्वीकारने की सौगंध है। 


इसी विश्वास ने चंद्रमा को 

चंदा मामा का पद दिया है;

इसी श्रद्धा ने करवाचौथ में 

पूजे जाने वाले करवा को 

करवा माता का सम्मान दिया है।


यह श्रृंगार का ओज है

या फिर भूख-प्यास से निर्लिप्त

देह के विश्वास का 

आध्यात्मिक समर्पण,

जो हाथों में आरती की थाली लेकर

बनी सँवारी देवी स्वरूपा स्त्रियाँ

चंद्र दर्शन की कामना लिए 

प्रेम और विश्वास के 

आशीर्वाद की कामना के लिए

बाहर निकल आती हैं।


अन्य पर्वों की तुलना में 

करवाचौथ का पर्व

उतना प्राचीन नहीं

किंतु लोकप्रियता में

सर्वाधिक मान्य पर्व है 

सौभाग्यवती स्त्रियों का 

सबसे प्रिय त्योहार है

पति की दीर्घायु,स्वास्थ्य

व अटूट सौभाग्य की कामना से

निराहार निर्जल व्रत

सांस्कृतिक चेतना का आधार है।


करवाचौथ प्रेम

और विश्वास का पर्व है;

चंद्रमा मन

और मान का प्रतीक है,

प्रेम का प्रतीक है

और यह प्रतीक युगों युगों से 

अखंड विश्वास का आधार है।


ये सुहाग,श्रृंगार,प्रेम,व्रत 

कोई बंधन नहीं,

बल्कि युगलों को जोड़ने के लिए

प्रेम के रस को

और गाढ़ा करने के लिए हैं। 


बना रहे सौभाग्य,

सजा रहे श्रृंगार !

सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए 

माता कौशल्या द्वारा

सीता जी को

दिया गया आशीर्वाद 

मंत्र बन सिद्ध हो,

अचल होऊ अहिवातु तुम्हारा।

जब लगि गंग जमुन जलधारा।।

   (रामचरित मानस)


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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