अन्तस् की देवी

 अन्तस् की देवी


        @मानव

शुंभ ‘आत्म-संदेह’

और निशुंभ ‘दूसरों पर संदेह का’

प्रतीक है;

जब व्यक्ति अपने आप पर 

संदेह करता है,

तो वह दूसरों पर भी

संदेह करने लगता है।


आत्म-संदेह के वातावरण में 

कोई भी रचनात्मक गतिविधि

नहीं हो सकती,

और जब दूसरों पर संदेह हो 

तो कोई भी महत्वपूर्ण 

उपलब्धि नहीं हो सकती। 


संदेह अच्छे गुणों

और प्रबंधन क्षमता को

दबा देता है,

जिससे हमारे

और आसपास के लोगों के लिए

दुख पैदा होता है।


जब हम संदेह की 

मनोस्थिति में होते हैं

और किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं,

जिसकी धारणा गलत होती है

तो वे हमारे संदेह को 

मान्यता देकर मजबूत करते हैं,

यही धूम्रलोचन है।


जो प्रभावी ढंग से

संवाद नहीं कर सकता

और बिना सोचे-समझे

हर कार्य करता है; 

दूसरा बिना सिर (मस्तिष्क) के 

वास्तविक संवाद नहीं कर सकता,

क्योंकि सभी संवाद

सिर के माध्यम से होते हैं;

अतः जब ज्ञान और कर्म

अलग हो जाते हैं

तो दोनों हमारे भीतर 

आसुरी वृत्तियों को जन्म देते हैं;

ये दोनों प्रवृत्तियाँ ही

चण्ड और मुण्ड हैं।


जो हमारे हर कोश में विद्यमान है,

वही 'कौशिकी' हैं;

हमारे पाँच कोश हैं:

अन्नमय कोश (भोजन), 

प्राणमय कोश (जीवनी शक्ति),

मनोमय कोश (मन), 

विज्ञानमय कोश (ज्ञान)

और आनंदमय कोश।


देवी कौशिकी आनंद,सुंदरता,

सत्य और ज्ञान की अवतार हैं,

जो संदेह,

धुंधली दृष्टि,

अभिमान

और बिना सोचे-समझे

कृत्य करने की प्रवृत्ति का 

विनाश करती हैं।


जब हमारी कुंडलिनी शक्ति 

जाग्रत होती है

तो सभी तरह के संदेह

मिट जाते हैं,

हमारी प्राणशक्ति बढ़ जाती है,

हम सहज हो जाते हैं

और विवेकपूर्ण कार्य करने में

सक्षम हो जाते हैं।


ध्यान की सुदर्शन क्रिया से

हमारे भीतर प्राणशक्ति

बढ़ जाती है,

जिससे आत्म-संदेह

या दूसरों पर संदेह की 

दुष्प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है।


तब हमारा दृष्टिकोण 

धुँधला नहीं रह जाता,

वह स्पष्ट हो जाता है;

धूम्रलोचन हार जाता है

और हमारे भीतर अहंकार 

और बेतुके कार्य करने की वृत्ति

समाप्त हो जाती है।


नवरात्र हमारे अन्तस् की

प्राण शक्ति को बढ़ाती है,

यही शक्ति

हमारे भीतर की देवी है,

जो मन में बैठे

सन्देह रूपी असुरों का

नाश कर सकती है।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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