माटी का दीया
माटी का दीया
@मानव
जीवन में अनवरत संघर्ष से ही
सफलता प्राप्त होती है;
इस लड़ाई में
हमारी सामर्थ्य से अधिक
हमारे धैर्य की परीक्षा होती है;
सामर्थ्य कम हो
तो भी अडिग धैर्य
सफलता-सूर्य के दर्शन
करवा ही देता है।
दीये एक गहरे सांस्कृतिक
और भावनात्मक
इतिहास के वाहक हैं,
ये हमारे भीतर बसे
आध्यात्मिक अंधकार को भी
दूर करने का निमित्त बनते हैं।
मिट्टी की महक
और घी या तेल से सिक्त
इन दीयों की लौ
हमारे मन के हर कोने में
रोशनी की एक नई लकीर
खींच देती है।
दीये अपने भीतर आत्मनिर्भरता
और सादगी के प्रतीक होते हैं;
मिट्टी से बना छोटा सा दीया
असीम ऊर्जा
और प्रकाश को प्रकट करता है।
इसके जीवन की सरलता,
विनम्रता और शाँति का द्योतक है;
जो हमें याद दिलाता है
कि बाह्य आडंबर
और तड़क-भड़क की तुलना में
सरलता एवं सहजता
अधिक स्थायी
और प्रिय होती है।
दीये का संघर्ष अनोखा है;
वह एक छोटी सी बाती
और तेल को साथ लेकर
घनघोर तिमिर से
लड़ने को डट पड़ता है।
चतुर्दिक व्याप्त अंधकार की
शक्ति असीम है,
वह ऊर्जा से लबालब है,
इसके बावजूद दीया
अपनी सामर्थ्य को जुटाता है,
संयम नहीं खोता।
वह धैर्य के साथ जलता है,
लघु सामर्थ्य से ही
अपने आसपास उजास का
साम्राज्य स्थापित करने लगता है;
घोर अंधकार के बावजूद
उसकी परिधि में अंधकार
घुसने का साहस
नहीं कर पाता।
दीया पूरे धैर्य और जीवट के साथ
अपनी लड़ाई लड़ता है,
वह सहायता की आशा नहीं लगाता,
व्यर्थ का रुदन
और प्रलाप नहीं करता।
अस्तित्व को बचाए रखने के लिए
पल-प्रतिपल लड़ना
संघर्ष करना
अन्यथा अंधकार का ग्रास बनना
यह उसकी नियति है
जिसे वह जानता है
संघर्षरत रहता है
भोर होते ही परिणाम
बदल जाता है,
अंधकार परास्त हो जाता है।
जो हमारे जीवन का आधार है,
जो हमारे अन्न का पोषण करती है,
उसी मिट्टी से बने ये दीये
हमें याद दिलाते हैं
कि हम भी प्रकृति का हिस्सा हैं।
हमारी मिट्टी
कभी कृतघ्न नहीं हुई,
वह जितनी बार भी रौंदी गई,
उतनी ही बार
पूरी जिद से उठ खड़ी हुई;
स्नेह की बाती को
सबसे पहले उसी ने
अपने हिवड़े में जगह दी,
उसे सिर हिलाते हुए
आकाश को चूम लेने की
इच्छा-शक्ति दी;
मिट्टी का छोटा सा दीया
यही कहानी दोहराता हुआ
आ खड़ा होता है बार-बार।
वह निवेदित होना जानती है
उसके प्रति,
जिसने उसे बनाया
और प्राणों से सींचा;
मिट्टी का जलता हुआ दीया
भगवान के प्रति
कृतज्ञता का दीप है;
वह संतोष,आत्मविश्वास की
अभिव्यक्ति है।
मिट्टी हमें यह सिखाती है
कि चाहे हम किंतने ही ऊँचे
क्यों न उठ जाएँ,
हमारे पैर हमेशा धरती से
जुड़े रहने चाहिए;
यह भाव हमें विनम्रता,समर्पण
और सहअस्तित्व का
संदेश देता है।
जब हम अपना घर-आँगन
और चौक-चौबारे को
प्रकाशित करते हैं,
तो यह अपने पड़ोसी,समाज
और संपूर्ण ब्रह्मांड को
रोशनी में समाहित करने का
एक प्रयास भी है।
यही दीपावली का मूल संदेश है-
प्रकाश फैलाओ,
अंधकार मिटाओ
और समृद्धि की कामना करो।
आधुनिकता के इस युग
मिट्टी के दीये हमें
हमारी जड़ों की ओर
लौटने की प्रेरणा देते हैं;
वे हमें सिखाते हैं
कि हम अपनी परंपराओं का
सम्मान करते हुए भी
आधुनिकता के साथ
संतुलन बना सकते हैं।
मिट्टी का दीया
पर्यावरण अनुकूल विकल्प है,
जो प्रदूषण से मुक्त है
और पृथ्वी के साथ हमारे
सँबंध को प्रगाढ़ बनाता है;
मिट्टी के दीये हमारे लोकजीवन,
कारीगरों
और ग्रामीण समाज के साथ
गहराई से जुड़े हैं।
दीये की लौ में एक अद्वितीय
गत्यात्मकता दिखती है;
वह निरंतर जलती रहती है;
बिना रुके,बिना थके;
निरंतरता और संघर्ष का
यही मंत्र हमारे जीवन में भी
प्रवर्तित होना चाहिए।
छोटे से छोटा दीया भी
यही सिखाता है
कि जीवन में
छोटी-छोटी चीजों का भी
महत्व होता है
क्योंकि बड़े-बड़े बदलाव
छोटी-छोटी कोशिशों से ही
प्रस्फुटित होते हैं।
दीया का सन्देश स्पष्ट है
हर रात के बाद
एक नई सुबह होती है
और हर अँधकार के बाद
प्रकाश का उदय होता है।
लौ जब मंद-मंद जलती है,
तो वह हमारे भीतर शाँति
और धैर्य का भाव भरती है;
जीवन की आपाधापी में भी
अपने भीतर शाँति
और संतुलन को बनाए रखना
हवा के रुख से संघर्ष करते
दीए की सशक्त प्रेरणा है।
दीपावली का प्रकाश
जीवन के प्रति हमारी आस्था
और सकारात्मकता का प्रतीक है;
प्रकाश हमारे भीतर निहित
आत्मा की रोशनी का भी प्रतीक है;
यह रोशनी यह बताती है
कि असली उजाला बाहर नहीं,
बल्कि हमारे भीतर है।
मिट्टी का दीया जलकर बुझ जाता है,
लेकिन उसकी स्मृति
और उसका प्रकाश
हमारे मन में सदा के लिए
बस जाता है।
प्रकाशपुंज जीवन की क्षणभंगुरता
और साधारणता के महत्व का
बोध कराते हैं;
दीपावली का उत्सव सिखाता है
कि जीवन में क्षणिक चीजों का भी
अपना महत्व है।
जीवन में साधारण चीजों में भी
असाधारण सौंदर्य
और लालित्य छिपा होता है;
यह सादगी,आत्मनिर्भरता
और समर्पण का उत्सव है,
जो हर साल हमारे जीवन में
नई रोशनी
और नई उम्मीदें लेकर आता है।
जीवन में संघर्ष के सत्य को
यदि हम स्वीकार करेंगे
उससे लड़ेंगे,जूझेंगे
तभी इतिहास रच पाएंगे;
अन्यथा जीवन की लड़ाई में
पीछे छूटते चले जाएंगे;
अतः हमें दीये को पाथेय मानकर
जीवन में अग्रसर होना होगा।
✍️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment