मातृरूपेण संस्थिता

 मातृरूपेण संस्थिता


         @मानव

भारतीय संस्कृति में

शक्ति उपासना का

सर्वोच्च स्थान रहा है;

शक्ति की उपासना

सिंधु घाटी से लेकर

नील घाटी तक फैली हुई थी।


प्राचीन भारत में

शिल्प आदि कलाओं के माध्यम से

मातृ शक्ति का स्तवन

किया गया है,

वैदिक काल से वर्तमान तक 

इसका वैभव प्रकट होता हुआ है।


भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में

मातृशक्ति पर

व्यापक रूप से विमर्श हुआ है;

शास्त्र विधान के अनुसार 

प्रतिमा की रचना होने पर ही 

वह पूज्य और आराध्या होती है,

फलतः उपासना के साथ-साथ 

प्रतिमा या शिल्प कला का भी

विकास हुआ है।


ऋग्वेद के अंतर्गत

श्रीसूक्त के रूप में 

मातृशक्ति उपासना का 

विस्तृत स्वरूप प्राप्त होता है;

वैदिक साहित्य

और तत्कालीन समाज में 

प्रचलित शक्ति की

उपासना परंपरा का संकेत

देवमाता अदिति,उषा, 

पृथिवी,वाक् यमी आदि के

उल्लेख से होता है। 


औपनिषदिक ग्रंथों में 

काली-कराली (मुण्डकोपनिषद्),

उमा- हैमवती(केनोपनिषद्) 

आदि का वर्णन है। 


भद्रकाली,भवानी,दुर्गा 

इत्यादि देवियों के नाम

सांख्यायन,

हिरण्यकेशी गृहसूत्र

तथा तैत्तिरीय आरण्यक जैसे

वैदिक ग्रंथों में हैं।


रामायण में राम की शक्ति-पूजा

उल्लेखनीय रही है;

महाभारत में शक्ति के स्तवन

विराट,भीष्म,वन पर्वों में है;

पाणिनि की अष्टाध्यायी में 

भवानी,शर्वाणी,रुद्राणी 

तथा मृडाणी का उल्लेख है। 


मार्कण्डेय पुराण में 

देवी-महात्म्य को 

दुर्गासप्तशती के रूप में

श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है;

इसमें शक्ति की स्तुति

बुद्धि,निद्रा,क्षुधा,छाया, 

शक्ति,तृष्णा,शाँति,लज्जा, 

जाति,श्रद्धा,काँति,लक्ष्मी, 

स्मृति,दया,तुष्टि,मातृ आदि 

रूप में की गयी है।


प्राचीन सिक्कों पर

लक्ष्मी के दर्शन

श्री,लक्ष्मी,गजलक्ष्मी

रूप में होते हैं,

जबकि भद्रघोष की मुद्राओं पर

वे कमलधारिणी देवी हैं।


गुप्तकालीन मुद्राओं पर 

कमलासना लक्ष्मी

एवं सिंहवाहिनी दुर्गा की 

सुन्दर आकृतियाँ मिलती हैं, 

जो भारतीय संस्कृति में 

शक्ति उपासना का उत्कृष्ट 

प्रतिरूप मानी जा सकती हैं।


यहाँ श्री की अवधारणा

गजलक्ष्मी,

पात्र से धनवृष्टि करने वाले 

यक्षों के साथ लक्ष्मी,

नौका पर आरुढ़ लक्ष्मी 

आदि  रूपों में भी मिली है।


चालुक्य,पल्लव

और चोल काल में

मंदिरों की बाह्य दीवारों पर

महिषासुरमर्दिनी का रूप-शिल्प

सुंदर मूर्तियों के रूप में 

देखने को मिल जाता है;

देवी की चोलकालिक प्रतिमाएँ

पत्थर के साथ-साथ

काँस्य में भी प्राप्त होती हैं।


प्रतिमाओं का विमर्श 

भारतीय कलाओं की समृद्धि,

रचनात्मकता

एवं आध्यत्मिकता का उद्घोष है।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments

Popular posts from this blog

भगवान के सन्देशवाहक

वट वृक्ष की शरण

मेवाड़ का सूर्य