हे नारायणी!

 हे नारायणी!


        @मानव

शरणागत की पीड़ा

दूर करने वाली देवि!

हम पर प्रसन्न होओ।

सम्पूर्ण जगत् की माता! 

प्रसन्न होओ।


विश्वेश्वरि !

विश्व की रक्षा करो।

देवि!तुम्हीं चराचर जगत् की 

अधीश्वरी हो।

तुम इस जगत् का

एकमात्र आधार हो;

क्योंकि पृथ्वीरूप में

तुम्हारी ही स्थिति है।


देवि ! तुम्हारा पराक्रम 

अलंघनीय है।

तुम्हीं जलरूप में स्थित होकर

सम्पूर्ण जगत् को

तृप्त करती हो।


तुम अनन्त बलसम्पन्न 

वैष्णवी शक्ति हो।

इस विश्व की कारणभूता

परा माया हो।

देवि!तुमने समस्त जगत् को

मोहित कर रखा है।

तुम्हीं प्रसन्न होने पर

इस पृथ्वी पर मोक्ष की 

प्राप्ति कराती हो।


देवि!सम्पूर्ण विद्याएँ

तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं।

जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, 

वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं।

जगदम्ब!एकमात्र तुमने ही 

इस विश्वको व्याप्त कर रखा है।


तुम तो स्तवन करने योग्य 

पदार्थों से परे

एवं परा वाणी हो। 

बुद्धिरूप से

सब लोगोंके हृदयमें 

विराजमान रहने वाली

तथा स्वर्ग एवं मोक्ष

प्रदान करने वाली हो।


कला,काष्ठा आदि के रूपसे 

क्रमशः परिणाम

(अवस्था परिवर्तन)

की ओर ले जाने वाली

तथा विश्व का उपसंहार 

करनेमें समर्थ हो  

नारायणि!तुम सब प्रकार का

मंगल प्रदान करनेवाली 

मंगलमयी हो। 


कल्याणदायिनी शिवा हो। 

समस्त पुरुषार्थों को

सिद्ध करनेवाली, 

शरणागतवत्सला,

तीन नेत्रोंवाली

एवं गौरी हो।


तुम सृष्टि,पालन

और संहार की

शक्तिभूता,

सनातनी देवी,

गुणों का आधार

तथा सर्वगुणमयी हो।


हे नारायणी!

तुम्हें नमस्कार है।

(श्रीदुर्गासप्तशती के

एकादशोऽध्याय पर आधारित)


✍️मनोज श्रीवास्तव

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