प्रकृति की कृतज्ञता का पर्व
प्रकृति की कृतज्ञता का पर्व
@मानव
जब अन्न के श्रृंगार से
सजी हुई धरती
नवरंग के हिंडोले में
झूलने लगती है,
अमावस को एक ओर ठेलती
दीपक की नन्ही सी लौ
अपनी मुस्कान बिखेर देती है।
दुख और दरिद्रता की
छाती पर चढ़कर
जब महालक्ष्मी का आकर्षण
जन-जीवन को उत्सव के
रङ्ग में रङ्ग देता है,
तब आता है
दीपावली का त्योहार;
जो भारतीय संस्कृति की
चमक बिखेरता
हमारे तन मन को
दीप्त कर देता है।
दीपावली पर गणेश जी
और लक्ष्मी जी का पूजन
यह बताने को पर्याप्त है
कि बुद्धिबल से
सकारात्मकता की संपदा हेतु
प्रयत्न किया जाए।
दीपावली की साँझ
माता लक्ष्मी घर के द्वार पर आती हैं;
वह अकेली नहीं आतीं,
हमारी इच्छाओं के
उत्सव-पुरुष गणेश
और विवेक की जाग्रत देवी
सरस्वती भी साथ-साथ आते हैं;
गणेश जी और सरस्वती का
साथ छोड़कर
लक्ष्मी को रहना पसंद नहीं।
गणेश जी का चूहा है
हमारी इच्छाओं को
कुतर डालेगा;
सरस्वती की वीणा
हमें अपनी झंकार से
जगाए रखती है।
गोवर्धन पूजा में 'गो' शब्द
इंद्रियों के लिए प्रयुक्त होता है;
जो सन्देश देता है
कि इंद्रियाँ इतनी जागृत हो जाएँ
कि जिस तरह इंद्र के कोप से
गोकुल में हाहाकार के विरुद्ध
कृष्ण ने अंगुली पर
पर्वत उठा लिया था,
उसी प्रकार मनुष्य भी
बाह्य आक्रमणों को
कनिष्ठिका जैसे लघु प्रयास से
मुकाबला करने में समर्थ हो सके।
दीपावली के महापर्व पर
गन्ने की पूजा
केवल इसलिए नहीं होती
कि वह उगाई गई नई फसल है;
वह जीवन के
उस वंश की पूजा भी है,
जो दुख की पड़ी गाँठों के बाद भी
रस से भरा हुआ है।
नए धान की पूजा
इसलिये नहीं
कि वह बाजार में
चमक भर देगा,
नया धान हमारी ऊर्जा है,
हमारी संजीवनी है;
इसीलिए बड़े-बूढ़े कहते आए हैं
कि जन्म के साथ
जो कुछ हमें मिला,
उसके लिए कृतज्ञ होने का
महान् उत्सव है दीपावली।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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