दिव्यता जागरण पर्व

 दिव्यता जागरण पर्व


             @मानव

देवोत्थान एकादशी पर 

त्रैलोक्य के पालनहार 

भगवान श्रीविष्णु के 

योगनिद्रा से जागरण के साथ ही

सकल दैवसत्ता चैतन्य होने से

समस्त शुभ कर्मों के

संपादन का अनुकूल समय 

आरंभ हो जाता है।


देव प्रबोधिनी एकादशी

हमें यह बोध देती है

कि अब अपने भीतर की 

दिव्यता को जगाने का

समय आ गया है।


भगवान विष्णु का

योगनिद्रा से जागरण

हमारे भीतर के चैतन्य के 

जाग्रत होने का संदेश देता है।


मनुष्य में विद्यमान

अपरिमित ऊर्जा

अतुल्य सामर्थ्य,

ओज-तेज आदि 

पारमार्थिक विभूतियाँ 

विवेक,शुभ-विचार

तथा सद्संकल्प द्वारा 

जाग्रत की जा सकती हैं;

देवोत्थान एकादशी

हमारे भीतर विद्यमान उन्हीं 

दिव्यताओं के जागरण की 

शुभ्र बेला है।


श्री,ऐश्वर्य

और आयुष्य स्वरूपा माँ वृंदा के

सत्य एवं धर्म स्वरूप 

भगवान श्रीनारायण को 

वरण करने से अभिप्राय यह है

कि धन-यश आदि संसार की

समस्त विभूतियाँ

धर्म और सत्य की अनुगामिनी हैं।


विचारों में

अद्वितीय सामर्थ्य विद्यमान है;

जीवन रूपांतरण के लिए 

वैचारिक शुचि-संपन्नता 

नितांत अपेक्षित है!


अंतर्मन शुभ-विचार संपन्न रहे,

अंत:करण में निरंतर 

शुभ-दिव्य विचार प्रसूत हो, 

ऐसी सचेतता रहे।


संसार की प्रायः सभी शक्तियां

जड़ होती हैं;

सिर्फ विचार-शक्ति, 

चेतन-शक्ति है,

जो हर क्षेत्र में काम आती है;

सकारात्मक विचार

नई दिशा देते हैं

यदि लक्ष्य मात्र एक हो

विचारों की शुचिता।


सभी एक परमात्मा की संतानें हैं,

अतः अन्य के अधिकार, सम्मान

और स्वाभिमान का 

अभिरक्षण करना

हमारा प्रथम कर्तव्य हो।


धर्म वह है,

जहाँ छल-कपट नहीं है, 

जहाँ धैर्य,क्षमा,इंद्रिय निग्रह, 

सत्य, अक्रोध, निराभिमानता

तथा अहिंसा है।


अतः एकता,सहकार, समन्वय

और परस्पर प्रीति द्वारा 

दुर्लक्ष्य और अप्राप्य वस्तुएँ भी

सहज सुलभ हो जाती हैं।


समन्वय जीवन

सिद्धि और सफलता का 

मूल मंत्र है;

सभी जातियाँ समान है

और सभी जातियाँ महान हैं;

हम सभी उस एक ईश्वर की 

संतानें हैं।


परमात्मा के निकट रहने में ही

उसकी स्तुति, प्रार्थना

तथा उपासना में ही

परम आनंद है।


जब हम किसी की प्रशंसा करते हैं,

किसी को अपने से अधिक योग्य,

दयालु,शक्तिशाली

तथा पूज्य मानते हैं,

तब हम अहंकार शून्य हो जाते हैं;

स्वभाव में विनम्रता

तथा सात्विकता आ जाती है,

जो कि बुद्धि को

संतुलित रखकर

कर्म करने की प्रेरणा देती है। 


विवेकपूर्वक किया गया कर्म 

तथा अहंकार रहित प्रार्थना 

हमें ईश्वर के निकट

पहुँचाती है;

यही हमारे भीतर

दिव्यता के जागरण को

सँभव बनाती है।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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