मन साधने का पर्व
मन साधने का पर्व
@मानव
दीपावली हर साल आती है;
कैसी भी विपत्ति हो
या संकट के बादल छाए हों,
निराशा के अंधकार को
चीरती हुई दीपावली आती ही है
और हमारे दुर्भाग्य को लपेटकर
किसी अज्ञात गह्वर में
फेंक देती है।
फिर शुरू होता है
जीवन का नया बहीखाता,
फिर बुनने लगता है
मीठे रिश्तों का स्वच्छ आकाश;
उत्साह और उमंग की
पाठशाला में
फिर गूँजने लगती है
सुख और समृद्धि की
बारहखड़ी।
ऋतुएँ आपस में
गले मिलने लगती हैं;
अमावस की कसौटी पर
पुरुषार्थ के खरे सोने की
लकीर खिंच जाती है;
आकाश से देव-जागरण के
मुहूर्त झरने लगते हैं।
निसर्ग की साधना का पीयूष
सबमें बराबर-बराबर
बंटने लगता है;
मन,कुबेर हो जाता है;
मंगल वेलाएं सुरम्य अल्पनाओं से
सजने लगती हैं
और हमारा चित्त
प्रेम और शाँति के जलाशय में
अवगाहन के लिए उत्सुक होता है।
धरती नृत्य करने लगती है
और आकाश से
पारिजात के फूल
बरसने लगते हैं।
दीपावली यह संदेश लेकर आ रही है
कि पैसे के पीछे ही भागते रहोगे,
तो पूरी शानो-शौकत में भी
अकेले पड़ जाओगे।
आह्वान करो प्रेम
और सामंजस्य की लक्ष्मी का;
आह्वान करो एकता
और अखंडता की लक्ष्मी का;
कहो कि हे महालक्ष्मी!
हमें मनुष्यता दें
एक-दूसरे को सहन करने
और साथ निभाने की शक्ति दें।
शुभकामनाओं की
फुलझड़ियों के बीच
जब आत्मविश्वास का अनार फूटेगा,
तब इंद्रधनुषी रंगों की बहारें
गुनगुनाएँगी
'मंगलघट ढलके,
ज्योति- कलश छलकें।
✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment