सनातन में सूर्य पूजा
सनातन में सूर्य पूजा
@मानव
सूर्य ऊर्जा का
सबसे बड़ा स्रोत है;
इसी कारण शास्त्रों में
उन्हें भगवान मानते हैं।
सूर्य के बिना
कुछ दिन रहने की कल्पना भी
जीवन के लिए भयावह है
जीवन के लिए इनका
रोज उदित होना जरूरी है।
ऋग्वेद के चौदह सूक्त
सूर्य को सर्वश्रेष्ठ देवता
घोषित करते हैं;
सूर्य ही जड़-चेतन,
चर-अचर
सभी का जीवन
संचालित करता है।
सूर्यदेव रात्रिकाल में
निश्चेष्ट पड़े जगत को
अपने उदय से
नवस्फूर्ति प्रदान करते हैं,
जिससे पृथ्वीलोक का
कार्यारंभ होने लगता है।
संपूर्ण चराचर के
जीवन प्रदाता भगवान सूर्य
एकमात्र प्रत्यक्ष देवता हैं;
भगवान राम,कृष्ण समेत
सभी ने उनकी
पूजा-उपासना की है।
पृथ्वी सहित
समस्त ग्रह उपग्रह
सूर्य की निरंतर परिक्रमा कर रहे हैं;
सूर्य से ही दिक्,देश,काल,
पृथ्वी,आकाश,नक्षत्रमंडल आदि का
विभाग होता है।
सूर्यदेव ऋतुचक्र के नियामक हैं,
इन्हीं के द्वारा पृथ्वी,अग्नि,
जल, वायु आदि का
पोषण हो रहा है।
सूर्योपासना,
सूर्यार्घ्य,
सूर्य के निमित्त
गायत्री मंत्र का जप,तप, व्रत
तथा संध्या वंदन आदि से
मानवों के मनोवाँछित कामनाएं
सदा से पूर्ण होती रही हैं।
इनकी उपासना करने वाले
कभी भी भग्न मनोरथ नहीं होते,
इनकी कृपा से सदा
संकटापन्न लोगों का
संकट कटता रहा है।
नवग्रहों का जन्मस्थान
नियत करते वाले
ज्योतिष
वराहमिहिर ने
सूर्य का आविर्भाव
अंगदेश में हुआ बताया।
कार्तिक मास की अमावस्या
प्राचीन काल में संवत्सर की
अंतिम रात्रि मानी गई थी,
इसे कालरात्रि भी कहते हैं।
इसके अगले दिन
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को
सूर्य की प्रथम किरण
प्राक् ज्योतिषपुर में
तथा पूर्ण सूर्योदय
अंगदेश में हुआ;
यही सूर्य का
उत्पत्तिस्थल माना गया।
प्रतिपदा से छठाँ दिन
शुक्ल पक्ष की षष्ठी है,
यह चराचर की आत्मा
भगवान सूर्य की रक्षिका
एवं आयु प्रदाता है।
छठ व्रत सूर्य भगवान,उषा,
प्रकृति,जल,वायु आदि को
समर्पित है;
सनातन धर्म में
आदि काल से ही
सूर्यपूजा महत्त्वपूर्ण है;
जहाँ छठ व्रत से सूर्यदेव
प्रसन्न हो वर देते हैं।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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