तमसो मा ज्योतिर्गमय

 तमसो मा ज्योतिर्गमय


          @मानव

मकर संक्रांति पर सूर्य 

उत्तरायण हो जाते हैं

और धरती पर प्रकाश का 

प्रभाव बढ़ जाता है।


यही यात्रा है

तमसो मा ज्योतिर्गमय की,

जब उन्नति,उत्तम विचारों, 

सात्विकता,कर्तव्यपालन 

त्याग,सत्य,दया,क्षमा आदि की ओर

हम प्रवृत्त होते हैं 

तब मानना चाहिए कि हम 

उत्तरायण की यात्रा पर चल पड़े हैं।


ज्योतिष चक्र की

कुल बारह राशियों में

सूर्य का भ्रमण होता है। 

जिसे सौर राशि कहते हैं;

सूर्य के एक राशि से

दूसरी राशि में प्रवेश को 

संक्रांति कहा जाता है।


जब सूर्य धनु राशि का 

भ्रमण पूर्ण कर

मकर राशि में प्रवेश को 

उद्यत होता है,

उसी काल को

मकर संक्रांति कहा जाता है।


मकर राशि का स्वामी शनि है,

जो सूर्य का पुत्र है;

मकर में सूर्य का प्रवेश 

पिता-पुत्र के पुनर्मिलन का 

संकेतक है।


सूर्य आत्मा का प्रतीक है, 

जबकि शनि दुःख कारक 

एवं दुःखहारक भी है;

शनि कर्म का भी प्रतीक है। 


सूर्य एवं शनि

दोनों जीवों के कर्मसाक्षी भी हैं;

न्यायाधीश शनि,

सूर्य के कर्माकर्म के विभाजन से ही

जीवों के प्रति सुख-दुख का 

फल दाता बनता है।


प्राचीन भारतवर्ष में

इसी दिन वर्षारंभ होता था;

आचार्य महात्मा लगध ने 

इसे युगादि अर्थात युगारंभ का

प्रथम दिन भी कहा है। 


शिशिर ऋतु का आरंभ

इसी दिन से होता है

इस संक्रांति को

‘अयनी’ संक्रांति भी कहा जाता है।


जब सूर्य क्षितिजवृत्त में 

अपनी दक्षिणी सीमा समाप्त करके

उत्तर की ओर चलना आरंभ करता है,

उसी कालखंड को उत्तरायण संज्ञा

प्रदान की गई है।


यहीं से दिन बढ़ने लगता है 

रात्रि घटने लगती है;

इसमें दिन अर्थात प्रकाश की

वृद्धि मंगलकारी कही गई है। 


उत्तरायण में पृथ्वी वासियों को

सूर्य का अधिक प्रकाश

प्राप्त होता है;

इसी काल को देवताओं का दिन

तथा दानवों की रात्रि कहा गया है।


इस दिन सभी सामान्य जल भी

गंगाजल की भाँति माने गए हैं;

इस संक्रांति की षटतिला संज्ञा भी है;

तिल मिश्रित जल से स्नान, 

तिल का तेल शरीर में लगाना,

तिल की आहुति,

तिल का जल,

तिल का भोजन

एवं तिल का दान

अक्षय पुण्यदायी माना गया है।


जब मनुष्य सद्विचार,विद्या, 

विवेक,वैराग्य,ज्ञान आदि के 

चिंतन में प्रवृत्त होता है,

यही उत्तरायण की स्थिति है 

तथा जब भोग सुख,काम, क्रोध में

वृत्ति लगाता है,

वही दक्षिणायन है।


जिसमें अपना पतन हो, 

अपनी हानि हो,

मन,बुद्धि आदि निम्नगामी हो जाए,

भोगों में ही मन रमें,

सर्वथा अवनति हो,

आत्मा मलिन हो,

अंधकार से तमोगुण से प्रीति हो जाय,

दर्प,दंभ,घमंड,क्रोध,अविवेक,

हिंसा,राग,द्वेष,अभिनिवेश के साथ

नकारात्मक प्रवृत्तियों में रुचि बढ़े,

जब हम सामने वाले व्यक्तियों को

अथवा अन्यान्य प्राणियों को

कष्ट देने की क्रिया में प्रवृत्त होते हैं,

तब दक्षिणायन में जीते हैं।


जब अपनी उन्नति से 

स्वयं दूसरों की उन्नति होने लगे,

हम उत्तम विचारों से युक्त हों, 

निर्भीकता,सात्विकता, 

यज्ञानुष्ठान,कर्त्तव्यपालन में 

कठोरता,कष्ट सहने की प्रवृत्ति हो,

संसार की कामनाओं से 

त्यागवृत्ति हो,

सत्य में रुचि हो,

दयाभाव,क्षमा,धैर्य के साथ 

अंत:करण की निर्मलता हो, 

भोगों से विरति हो

तथा प्राणी-मात्र से वैर

न करने की वृत्ति आ जाए, 

तब हम उत्तरायण की

यात्रा पर चल पड़े हैं;

इसीलिए वेदों का उद्घोष है- 

तमसो मा ज्योतिर्गमय।


✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments

Popular posts from this blog

भगवान के सन्देशवाहक

वट वृक्ष की शरण

मेवाड़ का सूर्य