साँस्कृतिक समागम का शँखनाद
साँस्कृतिक समागम का शँखनाद
@मानव
शताब्दियों से अनवरत
चली आ रही
साँस्कृतिक यात्रा का पड़ाव
जिसमें नदियाँ हैं,
कथाएँ हैं,
मिथक हैं,
अनुष्ठान हैं,
सँस्कार हैं,
सरोकार हैं
और शामिल हैं
हमारी अनगिनत आध्यात्मिक
और सामाजिक चेतनाएँ,
जिनके बलबूते हम
अपनी परंपराओं को
बखूबी निभाते आए हैं
वही कुम्भ है।
इस अद्भुत,अप्रतिम,
अलौकिक यात्रा में शामिल है
बारह वर्ष की प्रतीक्षा,
पवित्र नदियों के पुण्य तट,
नक्षत्रों की विशेष स्थिति,
विशेष स्नान पर्वों की धमक,
साधु-संतों की जुटान,
धर्म आकाश के सभी सितारे
और उनका वैभव,
कल्पवासियों की आकाँक्षाएँ।
अथक प्रवाहमान इस यात्रा में
नदियों की आवाजें भी हैं,
जिन्हें सुनने स्वयं कुंभ आता है
तो कुंभ में शामिल होने का
स्वप्न संजोए करोड़ों लोग भी।
लोकोत्सव की इस यात्रा में
भारतीय सँस्कृति
कुलाँचें भरती,
अठखेलियाँ करती
पूरे विश्व को स्वयं में
समाहित कर लेने की
ताकत दिखा देती है;
जहाँ 'वसुधैव कुटुंबकम' की
भारतीय अवधारणा
सहजता से चरितार्थ होती है।
भारतीय सँस्कृति की
अवधारणा में ही
सामूहिकता निहित है;
हमने सदा से ही विश्व को
एक कुटुंब मानकर
स्वयं को प्रस्तुत किया है।
हमारी साँस्कृतिक चेतनाओं में
समूह पहले आता है,
फिर व्यक्ति;
तभी कुंभ जैसे आयोजन
केवल देश को ही नहीं,
बल्कि पूरे विश्व को
अपने भीतर सहेज लेने का
सामर्थ्य रखते हैं।
सामूहिक सँस्कृति का
हिस्सा बनने
और उसे निभाते रहने की
सीख देने वाली पाठशाला
होते हैं हमारे ये कुंभ।
कुंभ मेला
मानवता की अर्मूत
साँस्कृतिक विरासत है;
सनातन के गर्व का महापर्व है,
परंपरा और आस्था की झलक है,
खुशियाँ जहाँ फूट पड़ती हैं।
विरासत में मिली संस्कृतियाँ
यहाँ पहुँचते ही बिखर जाती हैं,
अन्य लोक-सँस्कृतियों से
मिलकर किलोल करने,
अठखेलियाँ करने के लिए;
और सब के सब
बहुरंगी लोकरंग में
झूम उठते हैं।
अपनी बोली-बानी में
लोकगीतों के स्वरों को
एक लय-ताल में
बह जाने देते हैं लोग;
वे अपनी सुर-लय-ताल को
हमारी सामूहिक सँस्कृति की
विरासत का हिस्सा
बनाना चाहते हैं।
वस्तुतः कुंभ में
पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण का
भेद मिट जाता है
और यही वह बात है
जो कुंभ को वैश्विक बनाती है।
देश-दुनिया के लोग
अपने रहन-सहन,
सोच-विचार,
रीति-रिवाज,
सँस्कार-सरोकार,
आचार-व्यवहार की
भरी-पूरी थाती लेकर
कुंभ में शामिल होने आते हैं
और यहाँ बहुत कुछ बाँटकर
जगह बनाते हैं,
ताकि उसमें यहाँ से
कुछ नया सहेजकर ले जा सकें।
अपनी प्रकृति,
अपनी संस्कृति,
अपनी परंपराओं
और अपनों से नातेदारी
बनाने को प्रेरित करते कुंभ
हमारी आवश्यकता हैं।
वस्तुतः कुंभ मेले
हमारी साँस्कृतिक
सामूहिकता को समझने
व उससे जुड़ने के
मुक्त विश्वविद्यालय होते हैं।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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