राष्ट्रभक्ति व सँविधान
राष्ट्रभक्ति व सँविधान
@मानव
(१)
राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का पर्व
और देश का स्वर्णिम भविष्य
गढ़ने का अवसर है
गणतँत्र दिवस!
यह एक राष्ट्रीय महायज्ञ है
जिसमें हर नागरिक को
अपनी योग्यता
एवं सामर्थ्य के अनुसार
आहुति देनी है।
सत्कर्तव्य की यह आहुति
न केवल आत्मिक सुख
प्रदान करेगी,
अपितु राष्ट्र को सर्वोच्च पद पर
प्रतिष्ठापित भी करेंगी।
"वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः"
(यजुर्वेद)
इस मंत्र के साथ
यह पर्व जनमानस को
जागृत कर
राष्ट्रभक्ति के लिए
प्रेरित करता है।
ईश्वर की नवधा भक्ति से
कम नहीं होती राष्ट्रभक्ति!
अतः मन,वाणी एवं कर्म से
हमारा समग्र चिंतन
राष्ट्र को समर्पित हो।
जिस देश के नागरिकों में
गहन राष्ट्रभक्ति हो,
वहाँ के गणतँत्र को
कोई खतरा नहीं हो सकता;
गणतँत्र की सफलता
एवं देश के स्वाभिमान की रक्षा
नागरिकों की
उच्च चिंतन दृष्टि से होती है।
गणतँत्र दिवस सँविधान की
अभ्यर्चना का पर्व है
और योगक्षेम की प्राप्ति का
अप्रतिम साधन।
जब विधान के बिना
जीवन का उद्देश्य अपूर्ण रहता है
तो राष्ट्र का संचलन भी
सँविधान बिना असँभव है।
सामाजिक स्वतंत्रता,समानता
तथा न्याय का
सशक्त आधार होने से ही
किसी गणतँत्र की
रीढ़ मजबूत होती है।
गणतँत्र के बिना
राजनीतिक स्वतँत्रता अधूरी
तथा देश का विकास पंगु हो जाता है;
गणतँत्र को चिरंजीवी बनाने वाला
राष्ट्रीय एकता का
एकमात्र साधन यही है।
(२)
आधुनिक भारतीय
सँसदीय लोकतंत्र की यात्रा को
अमृत वर्ष तक
कालचक्र ले आया है,
परंतु भारतीय सँविधान से
निःसृत और विनियमित गणतंत्र की
विद्यमान संकल्पना
निस्सन्देह अपने स्वरूप,
संचलन और निर्मिति में
आधुनिक है।
गणतँत्र व्यवस्था के
समस्त उपकरणों,
निकायों,
संस्थाओं,
प्राधिकारियों
तथा अभिकरणों के
निष्पत्ति-सूत्र चिह्नित करते समय
हम गर्व और उत्साह के साथ
दृष्टिपात करते हैं।
अपनी अगण्य सँरचनात्मक
एवं प्रकार्यात्मक
विलक्षणताओं के कारण
विशिष्ट सम्मान
एवं श्रद्धा केंद्र बनकर
भारतीय सँविधान
सामान्य जनमानस की
अक्षुण्ण आस्था
एवं अप्रतिहत विश्वास का
केंद्रबिंदु बना हुआ है।
इसके प्रति अटूट विनय
और सँविधान निर्माताओं के प्रति
अप्रतिम आदर
हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
अपने अनेकानेक प्रविधानों में
शताधिक सँशोधन
हो जाने के बाद भी
भारतीय सँविधान
एक सनातन अभिलेख बना हुआ है।
सँविधान की नियमित
परिवर्तनशीलता पर
अपने मूल मंतव्यों
तथा नैतिक मानदंडों को
अपरिवर्तनीय बनाये रखने की क्षमता
इसे सनातन भारतीय परंपरा से
सँयोजित करती है।
यही सनातन दृष्टि
सँविधान की आत्मा
व प्राणवायु के रूप में
उसे अदम्य संजीवनी
प्रदान करती है।
सँविधान की अंतर्निहित
सर्व-समावेशी दृष्टि
भारतीयत्व के मूल विचार की
अंतर्दृष्टि है;
इसमें समस्त श्रेष्ठ विचारों की
सहज स्वीकार्यता का
विशिष्ट विचार विद्यमान है।
वैदिक काल से ही हम
'आ नो भद्राः
क्रतवो यंतु विश्वतः' की
उद्घोषणा करते आए हैं
जिसमें सभी श्रेष्ठ
एवं कल्याणकारी विचारों का
सभी दिशाओं
और सभी स्थानों से
स्वागत किया जाता है।
इसी दृष्टिकोण से
अन्यान्य सँविधानों में
प्रवृत्त श्रेष्ठ तत्त्वों को
भारतीय सँविधान के प्रारूप में
सम्मिलित करने की
प्रेरणा प्राप्त हुई।
राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में
भारतीय साँस्कृतिक विचार भूमि का
दिग्दर्शन कराने
और अपने दार्शनिक आधारस्तंभों को
चिह्नांकित करते हुए
भारतीय सँविधान परंपरा
और आधुनिकता का
अद्भुत सँयोजन करता है।
श्रेष्ठ तत्वों व विचारों की
सहज स्वीकार्यता
इसे विशिष्टतम
व स्वीकार्यतम बनाती है।
भारतीय सँविधान
साँस्थानिक निर्मितियों की
शक्ति सँरचना को न्यायप्रियता
और सदाशयता की तुला पर
स्थित करता है
परंतु किसी भी प्रकार की पक्षधरता
और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह के
सबल निषेध को भी
प्रविधानित करता है।
यह विशद सामाजिक
एवं साँस्कृतिक परिवर्तन का
सूत्रपात करने वाली
क्राँति का अग्रदूत भी बन जाता है।
यह भारतीय नागरिक की
राजनीतिक व्यवस्था में
आस्था का आधार
और सर्वाधिक सशक्त संबल है।
अपनी सुदीर्घ यात्रा में
भारतीय सँविधान
अनेक व्यवधानों
एवं विचलनों से
सर्वथा अप्रतिहत
भारतीय नागरिक की दृष्टि में
कभी निष्प्रभ नहीं हुआ।
यही उसकी सबसे बड़ी ऊर्जा है
जो अपनी शक्ति का सँचार
समस्त भारतीय नागरिकों में
सहज रूप में कर
स्वयं भी तेजस्वी हो उठती है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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