सृजन से विसर्जन तक की यात्रा
सृजन से विसर्जन तक की यात्रा
@मानव
परमार्थ प्रकृति का मूल स्वर है;
परमात्मा स्वयं भी
पारमार्थिक कार्यों में संलग्न है;
लोक कल्याण की संसिद्धि के लिए
समुद्र मंथन में
कूर्म का रूप धारण कर
मंदराचल पर्वत को
अपनी पीठ पर धारण कर
स्वयं भगवान नारायण
देवगणों के सहायक हुए,
जिसकी मूल भावना
सृजन की ही थी।
समुद्र मंथन
अर्थात् मनोमंथन
अर्थात् हम जब भी मंथन करते हैं
तो निश्चित रूप से सँकल्प लेते हैं;
यदि सँकल्प शुभ
व पारमार्थिक हो तो
नियंता,नियति,परमात्मा,प्रकृति
व सकल देवसत्ता
अभीप्सित लक्ष्य संप्राप्ति में
सहायक बनने लगते हैं।
वेदोक्त है कि
'तन्मे मनः शिवसँकल्पमस्तु'
अर्थात् जो मनोजयी है
वही अमृतत्व का अधिकारी है।
निरभिमानिता
ईश अनुग्रह
और समस्त लौकिक-पारलौकिक
अनुकूलताओं का मूल है।
समुद्र मंथन में निकला अमृत
श्रम की ही निष्पति थी;
देव-दानव सँग्राम में
अमृत घट से छलकी बूँदों से
महिमामंडित चार स्थानों में
कुम्भ राग गूँजता है।
कुम्भ पर्व के मध्य
पवित्र सलिलाओं का जल
अमृततुल्य हो जाता है;
इसके अतिरिक्त वैचारिक मंथन से
सत्संग रूपी अमृत भी प्राप्त होता है।
आत्मपरिष्करण
और जीवन निर्माण की
आधारशिला है सत्संग!
संत व सत्पुरुषों के सान्निध्य में
श्रद्धा एवं विश्वास की मथानी
और सत्संग-स्वाध्याय से
उपार्जित विचार अमृत ही
अनंतता,अपराजेयता,अमृतत्व
व जीवन सिद्धि का मूल हैं।
सत्संग,स्वाध्याय
और सत्पुरुषों के सान्निध्य में
जीवन की सम्पूर्णता प्रकट होती है;
भारत की कालजयी,
मृत्युंजयी सँस्कृति की
दिव्य अभिव्यक्ति
कुम्भ पर्व में गिरि,कंदरा,मठ, मंदिर
और आश्रमों में रहने वाले
लाखों सन्यासियों और संतों का
दर्शन व सान्निध्य
त्रिविध तापों का
शमन करने वाला होता है।
नश्वर जगत में ज्ञान,विवेक
और विचार सत्ता ही
चिरस्थायी है;
सृष्टि के स्वाभाविक क्रम में
जन्म,विकास,ह्रास और अंत
सभी अनन्त में विसर्जित होते रहते हैं।
सनातन धर्म का वैशिष्ट्य व सौंदर्य
आह्वान और विसर्जन की प्रक्रिया में
सहज दृष्टिगोचर है;
विसर्जन ही श्रेष्ठ सृजन की
भूमिका तैयार करता है।
हमारी सँस्कृति में
विसर्जन का अर्थ है,
पुनः सृजन;
आध्यात्मिक मूल्यों के प्रस्फुटन,
निर्बाध ज्ञान परंपरा के विकास,
जल सँरक्षण
और समष्टि के कल्याण को
समर्पित कुम्भ पर्व में
उत्सवकाल में
धार्मिक,
आध्यात्मिक
सास्कृतिक
एवं वैचारिक आयोजनों की
श्रृंखला के लिए
जनमानस का आह्वान कर
स्वस्थ व सकारात्मक विचारों का
सृजन किया जाता है।
विश्व को प्रेम,शाँति,सद्भाव
और समरसता के सूत्र देकर
कुम्भ पर्व का
विसर्जन कर दिया जाता है;
भारत की सामाजिक समरसता,
सांस्कृतिक एकता और दिव्यता की
अनुपम अभिव्यक्ति
कुम्भ पूर्व सृजन से
विसर्जन तक की यात्रा है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment