जीव-परमात्मा मिलन पर्व

 जीव-परमात्मा मिलन पर्व


              @मानव

कुम्भ का शब्दिक अर्थ

घट या घड़ा है;

आध्यात्मिक भाषा में

घट का तात्पर्य है-हृदय;

महा का तात्पर्य है- 

श्रीमन्ननारायण-

श्रीहरि

श्रीगोविंदादि 

भगवन्नाम-गुण-धाम।


हृदय में भगवान का

नित्य वास है;

जीव और परमात्मा का

मिलन ही महाकुम्भ है।


यह वैदिक-पौराणिक मान्यता का

महापर्व है, 

जहाँ विभिन्न क्षेत्र-भाषा-संस्कृति के 

साँस्कृतिक मूल्यों

और मानव समाज का 

अद्वितीय सँगम होता है।


देवराज इन्द्र पुत्र जयन्त 

जब अमृत कलश को लेकर 

आकाशीय मार्ग से

देवलोक जा रहे थे,

उस समय चन्द्र-सूर्यादि ने 

उसकी रक्षा की थी;

तत्समयानुसार ही

वर्तमान राशियों पर 

चंद्र-सूर्यादिक ग्रह

जब आते हैं,

तब कुम्भ का योग होता है।


जब देवगुरु बृहस्पति

वृषभ राशि में

और ग्रहों के राजा

मकर राशि में होते हैं

तो महाकुम्भ का आयोजन 

तीर्थ प्रयागराज में किया जाता है।


जब देवगुरु बृहस्पति

कुम्भ राशि में

और सूर्यदेव मेष में होते हैं

तब धर्मनगरी हरिद्वार में 

महाकुम्भ का आयोजन होता है।


जब सूर्यदेव मेष राशि में 

और देवगुरु बृहस्पति

सिंह राशि होते हैं,

तब कुम्भ मेले का आयोजन 

उज्जैन में किया जाता है। 


जब देवगुरु और सूर्यदेव 

दोनों ही सिंह राशि में होते हैं 

तो महाकुम्भ का आयोजन 

पञ्चवटी के नासिक में होता है। 


सनातन धर्म की

समृद्ध सँस्कृति का

महान और विशाल

उत्सव है महाकुम्भ!


मन रूपी समुद्र के मंथन से 

निःसृत अमृत कुम्भ की बूँद को

जीवन में अंगीकार करने का 

अवसर है महाकुम्भ!


योग,ज्ञान,जप,तप

और भक्ति का अनुपम समागम

तपस्वियों सन्यासियों

और सँतों का दर्शन

व सानिध्य प्राप्त कर

जीवन में धन्यता प्राप्त करने का

अद्वितीय अवसर है महाकुम्भ!


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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