माघ पूर्णिमा

 माघ पूर्णिमा


       @मानव

धर्मपरायण मानवों के लिए

धार्मिक,आध्यात्मिक, 

साँस्कृतिक,लौकिक

तथा पारलौकिक उन्नति के लिए

पुण्यभूमि भारतवर्ष में 

किए गए विधानों में

माघी पूर्णिमा विशिष्ट है।


सिद्धांत एवं संहिता ज्योतिष में

महीनों का कालमान

नौ प्रकार का होता है,

जिनमें चार प्रकार के महीने 

सौरमास,

चाँद्रमास,

सावनमास

तथा नाक्षत्रमास ही

नित्य मनुष्यों के

व्यावहारिक जीवन में 

उपयोग होते हैं।


इन मासों में

वैवाहिक कृत्यों में

सौरमास को

यज्ञ-अनुष्ठान,दान,जप-तप,व्रत में

सावन पूर्णिमाँत मास को 

तथा पितृ कार्यों हेतु 

चाँद्रमासों की महत्ता है।

     (गर्गाचार्य)

 

पूर्णिमाँत मास

जिस नक्षत्र से युक्त होता है 

(पूर्णिमा तिथि पर जो नक्षत्र है)

उसी पर उस महीने का नाम

ऋषियों द्वारा रखा गया है।

     (नारद सँहिता)


चित्रा नक्षत्र से चैत्र, 

विशाखा से वैशाख,

ज्येष्ठा से ज्येष्ठ,

आषाढ़ से आषाढ़,

श्रवण से श्रावण,

भाद्रपदा से भाद्रपद, 

अश्विनी से आश्विन, 

कृत्तिका से कार्तिक, 

मृगशिरा से मार्गशीर्ष,

पुष्य से पौष,

मघा से माघ

तथा फाल्गुनी से फाल्गुन मास हैं।

  (आचार्य महर्षि पाणिनि)


इन महीनों के नाम

मधु,माधव,शुक्र,

शुचि,नभ,नभस्य,

इष,ऊर्ज,सह,

सहस्य,तप तथा तपस्य

अतिप्राचीन वैदिक काल में प्रचलित थे।


वैदिक साहित्य में

सभी कालमान प्राकृतिक थे,

जो कालांतर में ऋषियों ने 

निरंतर आकाशावलोकन 

एवं अपनी योगज दृष्टि से

अनुभूत किए।


प्रायः एक मास तक

सूर्यास्त के पश्चात

पूर्वी क्षितिज पर

एक नक्षत्र उदित रहता है 

तथा पूरी रात्रि दिखाई भी देता है,

इसकी पूर्णिमा भी

उसी नक्षत्र में होती है

यही उस नक्षत्र की पूर्णमासी है,


मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा 

जिस मास में होती है,

वह मास माघ मास है;

माघ तपमास है

अतः इसकी पूर्णिमा को

माघी पूर्णिमा कहा जाता है।


बहुत काल तक

स्वर्गलोक में रहने की

कामना हेतु रखा गया

माघ स्नान व्रत नियम

तथा कल्पवास का

समापन हो जाता है। 


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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