प्रेम
प्रेम
@मानव
प्रेम हृदय की
कोमल अनुभूति नहीं,
अपितु दो आत्माओं के बीच
विश्वास की मजबूत कड़ी है
जो हर विपरीत परिस्थिति में
अडिग रहती है।
समर्पण प्रेम का आधार है,
जिससे एक दूसरे के
हृदय के स्पंदन की
अनुभूति होती है;
जो एक दिवसीय नहीं हो सकती।
प्रेम एक ऐसी अभिव्यक्ति है
जिसमें शब्दों से अधिक
भाव महत्वपूर्ण होते हैं,
यही भाव प्रत्येक रिश्ते का संबल
और उसके सशक्त बनाने वाला
स्तंभ बनता है।
प्रेम में कठिनतम परीक्षा होती है
जब समय की कसौटी पर
रिश्तों की परख होती है;
पिता का आश्वासन
सुरक्षा का अहसास है;
शिक्षक का मनोबल
शिष्य की प्रेरणा बन जाती है;
विवाह के समय
सुख-दुख में साथ निभाने का वादा
रिश्ते की नींव
वैवाहिक जीवन की गाड़ी को
आगे बढ़ाने वाला ईंधन हो जाता है।
सँबंधों के सागर मंथन से
निकला अमृत प्रेम है
पर छल विष के समान है;
स्नेहसिक्त संबंधों में
जब छल का विष घुल जाता है
तो विश्वास की नींव
दरकने लगती है।
अविश्वास न केवल
हृदय को छलनी करता है,
बल्कि रिश्तों को
गहरी गर्त में धकेल देता है
जहाँ से निकल पाना
अत्यंत कठिन हो जाता है।
अविश्वास का विष
आत्मा को खोखला कर देता है,
इसलिए प्रेम की डगर पर
आगे बढ़ने के लिए
हममें समर्पण की भावना
होना आवश्यक है।
निश्छल भाव से किया प्रेम ही
परिपूर्णता प्राप्त करता है,
जिसके सौंदर्य के समक्ष
परमात्मा भी आकर्षित हुए बिना
नहीं रह सकते।
प्रेम का वास्तविक स्वरूप
तभी खिलता है,
जब शब्दों से अधिक
कर्मों का महत्व होता है
और भौतिकता से अधिक
भावनाओं का।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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