धर्म का कुम्भ
धर्म का कुम्भ
@मानव
धर्म सूर्य की भाँति है,
यह बिना किसी भेदभाव
सबको आलोक
एवं मंगल बाँटता है।
धर्म जीवन का अभिन्न अंग है;
असंख्य लोग
सबसे गहन श्रद्धा के साथ
जिसे पूजते हैं,
वह धर्म ही है।
धर्म ही कामधेनु है;
धर्म ही कल्पतरु है;
जिसने धर्म को सही रूप में
स्वीकार कर लिया,
जीवन की सर्वोच्च निधि को
उसने प्राप्त कर लिया।
भारतीय संस्कृति का आत्मा धर्म है।
धर्म बहुत व्यापक है।
धर्म तो सत्य,करुणा और अहिंसा है।
आत्मशुद्धि का साधन है।
भारतीय मनीषा में धर्म
केवल ईश्वरीय आस्था ही नहीं है,
वह वैश्विक व्यवस्था है;
सृष्टि का सार्वभौम नियम है;
जीवन पद्धति है;
वह आंतरिक प्रकाश है;
आनंदमयी चेतना का स्पंदन है;
धर्म वह आचार संहिता है,
जिसमें सबका अभ्युदय निहित है।
धर्म मनुष्यता का मंत्र है,
उन्नति का तंत्र है;
पशुता को मनुजता में
रूपांतरित करने का यंत्र है।
धर्म एक मर्यादा है,
वह जीवन को मर्यादित करता है;
धर्म उत्कृष्ट मंगल है;
समस्त विघ्न,बाधाओं,कष्टों का
निवारक एवं सिद्धिदायक है;
यह विश्वशांति का
अमोघ साधन है।
महाकुंभ भारतीय धर्म
और संस्कृति का प्रतीक है,
जो दुनिया को एकजुट करने का
सशक्त माध्यम है,
यह सनातन की महत्ता दर्शाता है।
इसमें शामिल होने से मोक्ष मिलता है,
आत्मा की शुद्धि होती है;
आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं
धर्म की पुकार सदियों से
इंसानों को एक स्थान पर
खींचती आई है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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