सनातन की पावनता
सनातन की पावनता
@मानव
भक्त और भगवान का
महानतम मिलन है कुम्भ!
स्व-स्वरूप में स्थित होने का
विराट आयोजन है यह कुम्भ!
जहाँ ज्ञान की सरस्वती,
भक्ति की गङ्गा
और कर्म की यमुना का
महायोग होता है।
वेदों की ऋचाएँ भी
ज्ञान,भक्ति और कर्म का ही
अमृतमय शब्दरूप हैं,
जो श्रुति मार्ग से जाकर
हृदय देश में मिल जाती हैं।
अमृत तो मिलन में ही बरसता है,
वियोग में तो अश्रु प्रवाह होता है;
ईश्वर की इसी संपूर्णता के लिए
भक्त उमड़ रहे हैं।
यह केवल भारत में सँभव है,
यहाँ नदियाँ भी मिलती हैं,
धर्म भी मिलते हैं,
परंपराएँ और मान्यताएँ भी मिलती हैं।
सँत,गृहस्थ,विद्वान,
निर्गुण-निराकारवादी,
सगुण-साकारवादी,
भक्त,वेदान्ती
सब भगवान के बहुरंगे
रूप,गुण,कलाओं को
यहाँ देखने आते हैं।
यही इस देश की संस्कृति है,
यही सनातनता है,
जो मिलकर विलीन हो जाने को
अपनी पूर्णता मानती है।
जैसे वेद अपौरुषेय हैं,
वैसे ही कुम्भ की परिकल्पना भी
अपौरुषेय है;
अपौरुषेय व्यवस्था में
जब शासन और व्यवस्था
अपनी आस्था के पुष्प
व्यवस्था में लगकर चढ़ाते हैं,
तब वह सामाजिक भक्ति बनकर
आस्था के समुद्र बनकर
चिदाकाश बन जाता है
और भक्तों की भावना के
बादलों का रूप लेकर
भरपूर बरसता है।
कुम्भ स्नान का फल यह है
कि हमारे जीवन में भक्ति,ज्ञान
और कर्म इस रूप में हों,
कि हम भगवान के प्रति
प्रेम के समुद्र में मिल जाएँ।
स्नान करने का तात्पर्य है
अंग-प्रत्यंग डूब जाए जल में,
कुछ बाकी न रहे
तभी तो आत्मा
और शरीर का सँगम होगा।
तभी तो हम सब
एक ही कुम्भ में समा जाएंगे;
यही घट है,
यही मठ है;
मठ रूप समाज
घट रूप सँगम में सराबोर हो जाए,
तब होता है सँगम।
समाज और व्यक्ति
अमृतत्व की प्राप्ति की आकाँक्षा को
छुपाए-सँजोए हुए भटक रहा है;
कह नहीं रहा है,
पर भटक रहा है।
जब बड़ी और छोटी,
भारी और हल्की
सारी हस्तियाँ उस अमृतत्व को
चाहती और पाती हैं
तो महाकुम्भ का अमृतत्व तो
स्वयंसिद्ध है।
सबको मिला लेना,
सबको स्वीकार कर लेना ही
सँगम है,
यही समागम है
और यही सनातन है।
अन्यान्य तीर्थ इस कुम्भ का
दर्शन करने आते हैं;
सनातनता का कोई अंग
शेष नहीं रह जाता,
जो वहाँ दिखाई न देता हो।
इस कुम्भ में सब कुछ है;
सनातनता नारा नहीं लगाती है,
वह तो नारा बन जाती है
कि ऐसे बनो,ऐसा करो
और ऐसे दिखो।
चरैवेति चरैवेति का सिद्धांत भी
कुम्भ में देखने को मिलता है;
पहले गंगा,यमुना,सरस्वती
बनकर चलो,
फिर मिलो
और फिर समुद्र में मिलो
और तत्पश्चात बादल बनकर
वर्षा करो;
संसार के हर प्राणी को
अपनी उपलब्धि का लाभ दो।
सब राममय हो जाते हैं,
शिवमय हो जाते हैं
और श्याममय हो जाते हैं;
हमारी सँस्कृति की सनातनता,
पावनता का
मूर्त रूप है महाकुम्भ।
कुम्भ स्नान का फल यह है
कि हमारे जीवन में
भक्ति,ज्ञान और कर्म की
त्रिवेणी का मिलन इस रूप में हो
कि हम भगवान रूपी समुद्र के प्रति
प्रेम में मिल जाएँ।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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