एकता की परंपरा है कुम्भ
एकता की परंपरा है कुम्भ
@मानव
कुम्भ महामिलन है,
महासम्मेलन है;
यदि कुम्भ (घड़े) को देखें,
तो उसका उदर बड़ा है
और मुख संकीर्ण है।
तात्पर्य यही है
कि जो कहना है,
वह लघु रूप से
सूत्र रूप में कह देता है,
यद्यपि उसके उदर में तो
सब शास्त्र होते हैं।
इतना उदार उसका पेट है;
जल में कुम्भ है,
कुम्भ में जल है,
बाहर भीतर पानी।
(कबीर)
कुम्भ हमारी सँस्कृति से जुड़ा है,
हर माँगलिक कार्य में,पूजा में
कलश स्थापना होती है;
मंत्र भी ऐसे हैं
कि कलश के मूल,मध्य,मुख में
विविध देवता वास करते हैं।
हमारी प्रवाही परंपरा में
कुम्भ की बड़ी महिमा है,
हम गङ्गा को घर नहीं ला सकते,
लेकिन कुम्भ में भरकर
गङ्गा को घर में ला सकते हैं।
कुम्भ का मेला
मूल में तो स्वयंभू है;
कुम्भ नैसर्गिक है,कुदरती है;
कुम्भ अस्तित्व की व्यवस्था है,
मानव सर्जित नहीं है।
कुम्भ में सब आए हैं,
लेकिन स्पर्धा के लिए नहीं,
त्रिवेणी में स्नान करने के लिए,
कुम्भ जैसी एकता
कहीं नहीं मिलेगी।
यहाँ कोई नहीं पूछता
कि कौन ब्राह्मण है,
कौन क्षत्रिय है,
कौन किस जाति का है,
किस भाषा,प्रांत,वर्ण से है;
सब जुटे हैं,
बिना कोई नेटवर्क बनाए;
साधु-सँत सब सवारी निकाल रहे हैं;
कोटि-कोटि जन स्नान कर रहे हैं,
यह सबसे बड़ी एकता है।
धन्य है भारत की भूमि,
जहाँ तीन पावन नदियों की धारा
आपस में मिलकर हम सबको
मिलना सिखा रही है।
कुम्भ में लोग कुछ लेने नहीं,
बल्कि देने आते हैं;
पुण्य कमाने की इच्छा में
मीलों नंगे पाँव चलकर
अपनी पवित्र परंपरा का
वे दर्शन करने आते हैं।
कुम्भ विशेष भूमि पर होता है;
यह विशेष महिमा वाली भूमि है;
कुम्भ में बना-बनाया
वातावरण मिलता है;
हजारों वर्षों का पुण्य
यहाँ जमा है।
कुम्भ में किसी महात्मा से मिलना,
कल्पवासियों के दर्शन करना,
बहुत महिमा का काम है;
कौन क्या है,
कुछ नहीं कहा जा सकता।
इनमें कुछ प्रत्यक्ष चेतना हैं
तो कुछ अप्रत्यक्ष चेतना हैं;
हम किसी चेतना को न देख पाएँ,
न पहचान पाएँ,
लेकिन वह हमें देख ले
तो यह भी हमारा गङ्गा स्नान है।
दर्शन,स्नान,स्पर्श,पान की महिमा है,
साथ ही स्मरण की भी महिमा है;
कुम्भ की चेतना सभी को
अपनी तरफ आकर्षित कर रही है।
महाकुम्भ
केवल एक स्नान पर्व नहीं,
बल्कि आध्यात्मिक उन्नति,
साँस्कृतिक गौरव
और मानवता की एकता का
महोत्सव है,
इसमें आध्यात्मिकता
और विज्ञान
एक साथ चलते हैं।
महाकुम्भ मानवता के
ब्रह्माण्ड से जुड़ने
और जीवन के अमृत की
खोज का प्रतीक है।
कुम्भ और तीर्थ दिव्य ही हैं;
कुम्भ भव्यता से भरा है,
लेकिन मूल में दिव्यता है,
आज का विज्ञान
इसे और भव्य बना रहा है,
इस महाकुम्भ का सँदेश है
कि व्यक्ति-व्यक्ति,
परिवार-परिवार,
समाज-समाज,
भाषा-भाषा,
वर्ण-वर्ण,
जाति-जाति,
देश-दुनिया सबके बीच में
वैचारिक संगम हो;
बौद्धिक और हार्दिक संगम हो।
दुनियाभर में प्रयागराज घूम रहा है;
परमात्मा ने भी
जगत का कुम्भ बनाया है;
जगत रूपी चाक बनाकर
कुम्भ की रचना हुई है।
समुद्र मंथन से निकले
अमृत कुम्भ की बूँदें
जिन चार स्थानों पर भी गिरी हैं,
वहाँ अमृत होने का बोध होता है।
महाकुम्भ दिव्य-भव्य से आगे
सेव्य है;
कुम्भ समस्त वेद-शास्त्रों का
सत्व-तत्व भी होता है;
सत्व-तत्व का कुम्भ में दान करके
लोग धन्य हो जाते हैं।
सँगम में डुबकी लगाने पर
पूरा अंग अंदर जाता है;
यानी हमारे नेत्र,वाणी,कर्म, यात्रा
और प्रत्येक इंद्रियों का
सँगम होना चाहिए।
डुबकी लगाने से
सँगमी दीक्षा प्राप्त होती है,
डुबकी लगाने से ही
सँगम से अभिषेक होता है,
मनुष्य से परस्पर प्रेम का
सँगम होता है।
महा कुम्भ में एकत्र साधु-संतों का
चिंतन-मनन हितकारी है;
देशकाल के अनुसार परंपरा निभाना
महात्माओं की महानता है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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