शिव की पूर्णता शक्ति से

 शिव की पूर्णता शक्ति से


           @मानव

शक्ति को अपने शरीर का

आधा भाग सौंपकर

पूर्णता को प्राप्त करते हैं 

भगवान अर्धनारीश्वर!


यह दर्शाता है

कि स्त्री की शक्ति को 

स्वीकार किए बिना

पुरुष कभी पूर्ण ही नहीं हो सकता।


शिव पत्नी देवी पार्वती को 

हमेशा बराबरी का स्थान देते हैं;

यह रिश्तों की सच्ची साझेदारी है;

भोलेनाथ देवी पार्वती के 

मित्र भी हैं और गुरु भी;

साथ ही वे उनके प्रति समर्पित भी।


स्त्री और पुरुष के

इसी समभाव से

प्रकृति भी होती है लयबद्ध

और बनता है समाज!

प्रकृति के साथ प्राणी में 

करुणा और समभाव जगाने का

पावन अवसर है महाशिवरात्रि!


शिव न तो

कोई वैयक्तिक स्वरूप हैं

और ना ही

कोई भौतिक सत्ता का प्रतिरूप।


जो कुछ साँसारिक गतिविधि

अथवा सँसार के केंद्र में

हो रहा है

या ऐसा कुछ घटित होने के 

क्रम में परिकल्पित है,

उसका सारतत्व

अथवा निचोड़ का मूल बिंदु ही

शिव तत्व है।


अतः शिवत्व की परिकल्पना 

न केवल भारतवर्ष,

अपितु संपूर्ण विश्व के लिए 

आकाश तत्व जैसी है।


जिस तत्व के बिना 

जीवन-अस्तित्व की

कल्पना असंभव है,

उसकी ओर युवा वर्ग का 

आकर्षित होना स्वाभाविक है।


शिव स्वयं को,

प्रत्येक जीव मनुष्य को 

उसके भीतर स्थित

अनंत रिक्तता के भाव से 

परिचित कराते हैं

जो सृजन का उत्स है,

स्रोत है

तथा संहारकर्ता का प्रतीक भी।


युवा में शक्ति तो

भरपूर मात्रा में होती है, 

ऊर्जा का अक्षय स्रोत

और नवसृजन की प्रेरणा का

विस्तृत आकाश भी होता है,

उसमें आत्मविश्वास की पूर्ति हेतु

शिवरात्रि के पर्व में 

उल्लासित युवा वर्ग

अपनी मंगलकामना के साथ-साथ

आत्मविश्वास छलकता, 

लहराता सागर प्राप्त करता है।


शिवरात्रि का पर्व पर

इस प्रकार का आत्मविश्वास 

युवाओं में एक तरह से 

शक्तिसंचरण अवश्य करता है;

शिव के निर्भय और विरक्त होने से

भक्त भी निर्भय होकर ही 

जीवन में अग्रसर होता है।


शिव का पूर्णाभिषेक

समस्त आधिभौतिक कलह, 

कष्ट-व्याधियों से

मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।


भगवान शिव का

साधारण फूल-पत्तियों

व बेल,धतूरा,भाँग आदि

जहरीली प्रकृति को चढ़ाने से

प्रसन्न होना

हमें अपनी बुराइयाँ

और कड़वाहट का त्याग कर 

अपने को निर्मल बनाने का

सँदेश है।


शिव वाहन नंदी

सनातन में धर्म,ज्ञान,शक्ति 

और दृढ़ता का प्रतीक है,

जो पर्यावरण के लिए

पशुओं की रक्षा की महत्ता 

परिभाषित करता है।


भगवान शिव

कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं,

जो उनका प्रकृति प्रेम 

सोत्साह दर्शाता है। 


नीलकण्ठ का उनका स्वरूप

अपनी चिंता किए बिना 

धरती को बचाने के लिए

शिव का कालकूट विष पान 

युवाओं में उनके प्रति 

आकर्षण पैदा करता है।


इस पर्व का संदेश है

कि अज्ञानता की दृष्टि से 

जहाँ प्रकृति डरावनी बन जाती है

तो वहीं ज्ञान से देखने पर 

यह अति सुंदर प्रतीत होती है।


शक्ति और भक्ति को 

स्वीकार किए बिना

शिव की प्राप्ति

नहीं की जा सकती।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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