ज्ञान परंपरा का दिव्य अनुष्ठान
ज्ञान परंपरा का दिव्य अनुष्ठान
@मानव
कुम्भ मूलतः
तप,साधना,ध्यान,विमर्श
और वैचारिक आदान-प्रदान का
अप्रतिम पर्व है।
कुम्भ ज्ञान के मंथन का अवसर है;
इसी से ज्ञान की ऊर्जा का
विस्तार होता है
और विचारों के
नए गवाक्ष खुलते हैं।
ऐसे पावन अवसर पर
माँ सरस्वती का पूजन
अत्यंत कल्याणकारी
और मंगलकारी है।
ज्ञान के प्रभाव के कारण
ज्ञान के समान पवित्र
और शुद्ध करने वाला
अन्य कुछ नहीं है;
'न हि ज्ञानेन सदृशं
पवित्रमिह विद्यते।'
(गीता,चतुर्थ अध्याय)
हमारे शास्त्रों में
ज्ञान की उपासना,
ज्ञान की आराधना
और ज्ञान के दान को
सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
भारतीय दर्शन में ज्ञान को
सर्वश्रेष्ठ निधि कहा गया है;
ज्ञान-दान ही ऐसा दान है
जो लौटाया नहीं जा सकता है;
इसलिए ज्ञान-प्रणयन करने वाले
गुरु से कभी उऋण नहीं हो सकते।
विद्या सबसे बड़ा धन है;
विद्या या ज्ञान की निधि ही है
जो हमारा अंत तक साथ देती है;
निरंतर व्यय करने पर भी
जिसमें निरंतर वृद्धि होती है,
ऐसा सबसे बड़ा धन विद्या है;
'व्यये कृते वर्धति एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्!
माँ सरस्वती ज्ञान,विद्या, कला
और संगीत की देवी हैं;
जिन्होंने ब्रह्मा के आदेश पर
अपनी वीणा से
इस सँसार को वाणी प्रदान की थी।
बदलते समय के साथ
ज्ञान के संपादन तथा अर्जन का
स्वरूप बदल सकता है,
लेकिन ज्ञान का महत्व
कम नहीं हो सकता;
ज्ञान का स्थान
हमारे समाज में शाश्वत है..
यथावत् है।
जबसे सृष्टि की रचना हुई है
इस भूमि पर
ज्ञान का सृजन हुआ है
और वह परंपरानुसार
पीढ़ियों तक परिष्कृत होकर
प्रवाहित हुआ है।
भारत से ज्ञान की मूलधारा
नैसर्गिक रूप से
प्रवाहित होती रही है
तथा समूचा विश्व
उससे आप्लावित होता रहा है।
हमारे यहाँ ज्ञान की अवधारणा
मौलिक और रचनात्मक है;
इसलिये ज्ञान के स्रोत भी
बहुमुखी-बहुआयामी हैं।
यह वही भूमि है
जहाँ से मौलिक ज्ञान की
अनेक धाराएँ सहज ही बही हैं
और समूचे विश्व में
प्रसारित हुई हैं।
ज्ञान मनुष्य का
सर्वाधिक परिवर्तनकारी
उपकरण है
और भारतीय मनीषा में
इसको सर्वोच्च स्थान
दिया जाता रहा है।
अष्टावक्र गीता से लेकर
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक,
यह नित परिमार्जित होता
ज्ञान ही है,
जो जीवन-समाज-संसार को
सँचालित करता है।
विद्या तथा ज्ञान की देवी की
उपासना के पर्व पर
हम अपनी मौलिक
और रचनात्मक दृष्टि
ऐसे ज्ञान की पिपासा में लगाएं,
जो विश्व के लिए
कल्याणकारी हो।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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