पूर्णता,शाँति और एकता का निदर्शन
पूर्णता,शाँति और एकता का निदर्शन
@मानव
पूर्णता का प्रतीक है कुम्भ;
ब्रह्म ज्ञानी संतों
और सिद्धों को
कुम्भ कहकर भी संबोधित करते हैं।
घटपट वेदांत की दृष्टि से
जीव घट है,
आत्मा आकाश रूपी है
और मानव समुदाय
घटों का एक समावेश।
कुम्भ ऐसा विचित्र मेला है,
जहाँ वे संत मिलते हैं,
जिन्हें कुछ भी नहीं चाहिए
और वे साँसारिक लोग भी मिलते हैं,
जिन्हें बहुत कुछ चाहिए।
इस महासँगम में तपस्वी,
जिन्हें तपस्या के बल के
अहंकार में नहीं उलझना,
अपने अर्जित पुण्य
सब पर बिखेर देते हैं।
यह एक सुअवसर है
सूक्ष्म और स्थूल जगत के सबंध को
अनुभव करने का,
सिद्धों और साधकों की
पावन,कल्याणमयी,
रोमांचक ऊर्जा में
अनुग्रहीत होने का।
कुम्भ एक आध्यात्मिक महोत्सव है,
जहाँ क्षणभंगुर सँसार में
उलझे व्यक्ति को
जीवन के परम लक्ष्य पर
चिंतन करने,
अतृप्त मन को
निज पूर्णता से अवगत होने
और परमात्मा से अपने
अक्षुण्ण संबंध को अनुभव करने का
सौभाग्य प्राप्त होता है।
योग यज्ञ,
ज्ञान यज्ञ,
जप यज्ञ,
और भक्ति यज्ञ का
अनुपम समागम है कुम्भ!
ब्रह्मांडीय शक्तियाँ इन दिनों
एक लयबद्ध रूप में होती हैं,
आत्मा अमर है
और भक्ति अमृत स्वरूपा है,
ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में
अपनी पहचान विलीन कर देना
और पूर्णता को प्राप्त करने की
यह प्रथा है।
कुम्भ में कल्पवास करते हुए
आत्मचिंतन करना
और सत्य संकल्पी होकर
समाज में लौटना ही
कुम्भ यात्रा सफल करता है।
जनमानस के हृदय पटल पर
कुम्भ सकारात्मक प्रभाव करता है;
यह जीवन के अत्युत्कर्ष
सत्य की खोज
पुण्य के उपार्जन
और परस्पर सहयोग पूर्ण जीवन का
एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
कुम्भ में करोड़ों के
एकत्रित होने पर भी
एक-दूसरे के प्रति करुणा,
सेवा और परहित का मनोभाव,
शुद्ध आचरण झलकता है।
यदि संपूर्ण विश्व
सदा ही कुम्भ महोत्सव की
भावना जीवन्त रखे
तो न चोरी होगी,न हिंसा,न युद्ध।
विश्व शाँति की संभावना
अवश्य सदृढ़ हो जाएगी।
अतः विश्व शाँति का,
वैविध्यता में एकता
और परस्पर सहयोग का
एक निदर्शन है कुम्भ!
✒️मनोज श्रीवास्तव

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