महाकुम्भ का सन्देश

 महाकुम्भ का सन्देश


      @मानव

धरती पर अमृत कलश 

छलकता रहा

और उसके अनुभव को

मन भर सँजोने की साध के साथ

जन समुदाय

तत्पर और समर्पित रहा।


भारतीयों की दृढ़ आस्था 

करोड़ों लोगों को कुम्भ की ओर

आकर्षित करती रही

और बिना किसी बुलावे के।


वहाँ उमड़ता अपार जन समुद्र

एक ही आकाँक्षा को लेकर 

आगे बढ़ रहा था

कि माँ गङ्गा का स्पर्श हो, 

उसके छींटे पड़ें

और मन तृप्त हो जाए।


इस क्षण के लिए लोगों ने 

बहुत सारी मुश्किलों का

सामना किया

पर वे सबकी सब

डुबकी लगाते ही

झट से लुप्त हो गईं।


भारत की साँस्कृतिक 

जीवन यात्रा का

यह विलक्षण पड़ाव था,

भारत के गौरव को

प्रतिष्ठित करने वाला

यह आयोजन सिद्ध हुआ। 


धर्म और आध्यात्म के

कई चमकीले और भड़कीले

रङ्ग भी दिखे;

नागा,अघोरी,शैव,वैष्णव 

और विभिन्न मत-मतांतरों का

अनुसरण लेने वाले साधु-सँत

अंततः आत्मचिंतन

और आत्मोन्नयन की ओर ही

उन्मुख होने की अपील करते रहे।


उपस्थित जनसमूह में 

भाषा-भेद भी थे

पर सभी आस्था की भाषा से

आलोकित हो रहे थे।


समूह मन कैसे काम करता है

और किस तरह आमजन 

अपने-अपने सच को गढ़ते हैं,

इसका अनुमान संगम क्षेत्र से

छन कर आ रही

किस्से-कहानियों से झलकता है

जिसमें गङ्गा स्नान से

अपने को नया करने

अपनी आस्था और निष्ठा को

जीवंत करने की चेष्टा थी। 


एक अदम्य,उत्कट जिजीविषा

और सँकल्प के साथ असँख्य लोग

जिस रूप में उपस्थित थे 

वहाँ एक सभ्यता

शब्दों से अधिक भाव

और कर्म में स्वयं को 

प्रमाणित करती दिख रही थी।


लोगों को अपने अस्तित्व का 

मानों नया सँस्करण मिल गया हो,

साधु,संत,संन्यासी,

गृहस्थ,भिखारी,धनाढ्य

हर कोई एक ही साध के साथ

गङ्गा के निकट और

सँगम क्षेत्र में जुटा था।


इस बात को भी बल मिला 

कि भारत के लोगों को

उस दैवीय शक्ति पर

अगाध श्रद्धा है,

जो मनुष्य को प्रेरित करती है

कि वह ऐसे अवसरों पर 

आगे आकर जीवन के 

रहस्यों से परिचित हो

और अपनी आध्यात्मिक 

भूख शाँत करें।


कुम्भ साधु-संतों

और भक्तों के मिलन का 

एक बड़ा केंद्र बनता है;

कुम्भ आध्यात्मिक ज्ञान का 

केंद्र ही नहीं बनता,

बल्कि साँस्कृतिक आदान-प्रदान का

माध्यम भी बनता है।


यह स्वाभाविक ही है

कि लोग कुम्भ को

दैवीय कृपा का

आशीर्वाद मानते हैं;

इसके अतिरिक्त वह 

सामाजिक समरसता का भी 

परिचायक होता है।


यह प्रकृति का दर्शन है

और कुम्भ जाकर हम पृथ्वी पर

जीवनदायी सबसे अहम् 

स्रोत-जल का नमन करते हैं;

कुम्भ जल स्रोतों की

महत्ता का भी परिचायक है।


महाकुम्भ ने जहाँ आस्था का

नया शिखर स्पर्श किया,

वहीं यह भी बताया

कि भविष्य में ऐसे आयोजनों में

लोग और बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे।


देश का यह ऐक्य बोध

एक बड़ी थाती है

और लोगों के मन में

अभी भी विराज रही धर्म-बुद्धि के

महत्त्व को उजागर करती है।


गङ्गा-स्नान के अवसर पर 

सभी एक ही भाव-धारा के अंश थे;

इसकी ऊर्जा का

राष्ट्र के विकास में

सार्थक निवेश होना चाहिए।


✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments

Popular posts from this blog

भगवान के सन्देशवाहक

वट वृक्ष की शरण

मेवाड़ का सूर्य