जीवन का सत्य

 जीवन का सत्य


              @मानव

हिरण्यकशिपु पिता है,

पिता से ही पुत्र आता है,

पुत्र उसी का अँकुर है,

हिरण्यकशिपु को पता नहीं 

कि मेरे प्राणों से

आस्तिकता जन्मेगी।


लेकिन प्रह्लाद जन्मा;

छोटा-सा अंकुर;

उससे हिरण्यकशिपु को

डर भी क्या था?

लेकिन जीवनभर की 

मान्यताएँ-धारणाएँ

दाँव पर लग गई होंगी।


हर बेटा बाप के विरुद्ध

खड़ा होता है;

हर आज,

कल के विरुद्ध खड़ा होता है;

वर्तमान,

अतीत से छुटकारे की चेष्टा है;

अतीत पिता है,

वर्तमान पुत्र है।


बीता कल जा चुका,

फिर भी उसकी पकड़ गहरी है;

हम उससे छूटना चाहते हैं, 

पर अतीत हमें पकड़ता है।


सँप्रदाय अतीत है,

धर्म वर्तमान है;

सँप्रदाय यानी हिरण्यकशिपु;

धर्म यानी प्रह्लाद;

निश्चिततः हिरण्यकशिपु 

शक्तिशाली है।


प्रह्लाद की सामर्थ्य क्या है? 

नया-नया उगा अँकुर है;

सारी शक्ति तो अतीत की हैं, 

वर्तमान तो ताजा-ताजा है। 


पर मजा यही है

कि वर्तमान जीतेगा

और अतीत हारेगा;

क्योंकि वर्तमान जीवंतता है 

और अतीत मृत्यु है।


हिरण्यकशिपु के पास शक्ति थी,

पर शक्ति नहीं जीतती, 

जीवन जीतता है।

इसलिए पुराण तथ्य नहीं है,

सत्य है।


हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद 

प्रत्येक व्यक्ति के भीतर 

घटनेवाली घटनाएँ हैं;

जब तक हमारे मन में सँदेह है,

हिरण्यकशिपु है।


भीतर उठते श्वद्धा के अँकुरों को

हम पहाड़ों से गिराएँगे,

पानी में डुबाएँगे,

आग में जलाएँगे,

लेकिन उसको जलाने में 

हमारे ही हाथ जल जाएँगे।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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