प्रेम रङ्ग हो ली

 प्रेम रङ्ग हो ली


              @मानव

भारतीय पर्वों-त्योहारों में 

राधा-कृष्ण

शाश्वत मिथक के रूप में व्याप्त हैं;

राधा-कृष्ण की यह अवधारणा

होली पर्व के माध्यम से 

अनेक स्तरों पर

भारतीय सँस्कारों में

रिसती रहती है।


होली अभिसार-क्षणों की 

वह एकात्मक

और एकाँतिक अन्विति है, 

जिसमें स्थूलता,

रङ्गों की सूक्ष्मता द्वारा 

रूपायित होती है।


माँसलता और दैहिक गंध की

समाप्ति के आगे की

यह यात्रा होती है, 

जिसमें गाँव की किशोरी किशोर की,

राधा कृष्ण की हो ली;

आत्मा परमात्मा की हो ली 

और यह धरती,सूर्य की हो ली।


राधा-कृष्ण की होली तो 

जग-जाहिर है;

ब्रज की गलियों में

होली की आकुलता से 

तंतु-तंतु सराबोर हो जाता है।


कृष्ण-प्रिया राधा

अपने स्वरूप की सार्थकता ही

कृष्ण की प्रीत के रङ्ग से 

प्राप्त करती है।


आत्मा-परमात्मा के

बीच की होली तो

अध्यात्म और दर्शन की 

गलियों से गुजरती हुई 

ब्रजमण्डल (ब्रह्माण्ड) में 

समाप्त होती है।


जहाँ ब्रह्मरंध्र रूपी पिचकारी से

अमृतरूपी रङ्ग टपकता है 

और आत्मा पूर्णरूपेण रङ्ग जाती है;

इस स्थिति को कोई-कोई पहुँचता है।


होली के क्षण,

मिलन के क्षण हैं;

आत्म-बोध के क्षण हैं;

स्वयं से परिचय के क्षण हैं;

द्वैत से अद्वैत की स्थिति 

पाने के क्षण हैं।


सारे ग्रह-नक्षत्र सूर्य की 

अँगुलियों पर नाच रहे हैं;

सूर्य केंद्र है

और ग्रह-नक्षत्र वृत्त;

सूर्य कृष्ण हैं,

ग्रह-नक्षत्र गोपियाँ।


उन गोपियों में केवल राधा ही

कृष्ण से आत्मीय

और भक्तिसिक्ता है;

यह वसुधा राधा है,

जो अपने कृष्ण से

मिलने के लिए आ खड़ी है। 


आकाश वीथी में पैर रखते ही

सूर्य ने अपनी सतरङ्गों वाली 

पिचकारियाँ मुखरित कर दीं;

प्राची के आँगन में

रंगों की झड़ी मच गई;

देखते ही देखते पूरी धरा 

लजा-लजाकर रङ्ग गई, 

भीज गई।


वसुंधरा,उत्सवा बन गई;

रोएं बने हजारों-हजार 

पेड़,पौधे,लता,सुमन,तृण 

सब रङ्ग गए;

धरती,जो स्वयं रसा है, 

रस-गृहिणी बन गई।


सूर्य और धरती के बीच होली

अनादिकाल से चली आ रही है;

सुख-दुख का

समन्वयात्मक दर्शन लेकर

रङ्गों की पिचकारियों के साथ

सूर्य बरस बरस जाता है।


भू का हृदय आनंदोल्लास से भर

गा उठता है कोयल के स्वर में;

वन-प्रांतर अपनी-अपनी 

पोशाकें पहनना शुरू कर देते हैं।


आम की डाली महक उठती है;

खेत झूम-झूम जाते हैं;

नीड़ों में कलरव जाग पड़ता है;

धरती-सूर्य के अभिसार-क्षणों की 

उद्घोषणा करने हेतु भौंरे 

दिशा-दिशा में दौड़ पड़ते हैं।


यह होली अद्भुत है,

जिसमें धरती पूरी तरह 

अपने अहं का विसर्जन कर 

आत्मविस्मृति की में पहुँच गई है।


होली के विभिन्न रङ्ग

उत्सव को अभिव्यक्ति देते हैं;

यह उत्सव

आत्मा के स्तर पर होता है।


सूर्य की किरणों से ही

रङ्गों का आभास होता है;

सारे ही रङ्ग सूर्य से निकले हैं;

एक सूर्य से निकलकर

वे धरती के द्वार द्वार

निर्द्वन्द्व भाव से पहुँचते हैं;

हर जाति,धर्म,वर्ण वाले 

व्यक्ति को रङ्गते हैं;

उनके पास भेद-भाव नहीं।


सूर्य प्रकाश-पुँज

होने के साथ ही साथ

रङ्गों का चितेरा है;

वह निरंतर धरती

और धरतीवासियों के साथ 

होली खेलता रहता है।


उत्सव-आकुल हृदय की धरती

सूखी की सूखी पड़ी रह जाती है;

क्यों न हम भी सहज भाव से

प्रेम के रङ्ग में भीग जाएँ? 


जाति,धर्म,सँप्रदाय की 

दीवारों को तोड़

होली के रङ्ग में डूबकर

हम अरूप बनें;

भारतीय बनें;

शरीर को रङ्गते बहुत हो गया,

अब तो आत्मा को रङ्गने की बेला है।


होली के विभिन्न रङ्ग

विभिन्नता में एकता की 

हमारी सँस्कृति को सुदृढ़ करते हैं;

अभिसार उत्सवा पृथ्वी

और रङ्गशिल्पी सूर्य के बीच 

जो होली होती है,

वैसी ही होली हम सबकी हो।


हमारी धरती प्रेम में

अपने अहं का विसर्जन कर देती है;

ताकि प्रेम के रङ्ग में भीगकर 

एक बार फिर धरती के आँगन में

एकता का उत्सव मना सकें 

और मानवता नाच उठे।


✍️मनोज श्रीवास्तव

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