नव सँवत्सर

 नव सँवत्सर


          @मानव

नव संवत्सर के प्रवेश से

नूतनता का चतुर्दिक प्रसार 

दृष्टिगोचर हो रहा है; 

रस-राग और सुगंध से

भरी प्रकृति में

तितलियाँ,भ्रमर और कोयलें 

अपने उन्मुक्त उल्लास के द्वारा

समृद्धि का सँकेत कर रहे हैं।


भारत इस अर्थ में विलक्षण है

यहाँ वर्ष का नवीकरण

मात्र आँकिक गणनाओं के 

अधीन नहीं,

अपितु संपूर्ण पर्यावरण 

व नवीनता को अंगीकार कर 

नए संवत्सर के आगमन का 

उत्सव मनाता प्रतीत होता है।


पारंपरिक रूप से 

भारत में नव वर्ष में

ऋतुएं बसती हैं,

उसे संवत्सर कहते हैं;

सँवत्सर शब्द का अर्थ 

इसकी अंत:क्रिया को व्यक्त करता

इसकी चरितार्थता को भी 

स्पष्ट करता है।


सँवत्सर के प्रथम ऋतु के रूप में

वसंत का आगमन होता है; 

वसंत ऋतु के चैत्र

और वैशाख महीने हैं,

जिन्हें क्रमशः मधुमास

और माधवमास कहा जाता है-

‘वसंतौ मधुमाधवौ’।


यह मधुऋतु है,

मधु अर्थात जीवन का सत्त्व;

इसी से जीवन की गति है;

इसी मधु की न्यूनता,

इसका सूख जाना

शिशिर ऋतु के रूप में 

दिखाई पड़ता है।


पत्ते वृक्षों से गिर जाते हैं,

वनस्पतियाँ अपने रस-राग से

रहित प्रतीत होने लगती हैं,

इसी वसंत से प्रारंभ होता है 

हमारा नव संवत्सर।


यह कालपुरुष के अनवरत 

चक्रमण का ही प्रतिफल है;

नव संवत्सर अपने आगमन से ही

हमारा ध्यान मधु की ओर ले जाता है

अंतर्निहित मधु का ही

सारा जीवन विलास है,

इसे हम जीवन में भोगते 

और चुकाते जाते हैं।


वेद कहते हैं -

मधु भूयासं मधु सदृशः

हम मधु सदृश हो जाएँ;

यही मधु हमारे जीवन में 

‘आनंद’ कहलाता है;

यह आनंद जीवन का मधु है;

इसी से परमात्मा ने सृष्टि को रचा है।


अपने सत और चित से 

असावधान होकर भी

जीव की लालसा

इस आनंद के प्रति कम नहीं होती।


इस आनंद तत्त्व को

स्वयं में पहचानने का 

अवसर है नव संवत्सर; 

बदलते जाते ऋतुचक्र में 

हमारा आनंद क्षरित होता जाता है,

प्रकृति में जीने का अभ्यास करें,

तो जीवन खुशियों से भर जाएगा।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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