विक्रम की विजय ध्वजा

 विक्रम की विजय ध्वजा


            @मानव

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 

विक्रम संवत् के

आरंभ होने का दिन है,

विश्व के सबसे पहले गणतंत्र का

स्थापना दिवस होने के साथ-साथ

सृष्टि के आरंभ का भी दिन है।


अब से 2082 वर्ष पहले 

शकों को परास्त कर

मालव गणराज्य की

जो अविस्मरणीय जीत हुई, 

उसे राष्ट्रीय गौरव का विषय मानकर 

घर-घर, द्वार-द्वार

गुड़ी बाँधने की परंपरा के कारण

यह गुड़ी पड़वा का भी दिन है।


गुड़ी विजयोल्लास की देवी है,

नए सँवत्सर की 

शुभ-संदेशवाहिका है;

यह नव-संवत्सर की 

सनातन उषा ही है

जो हमारे द्वार पर

उत्सव बनकर आ खड़ी होती है।


विक्रम सँवत् सूर्य-गति पर नहीं,

चंद्रमा की कलाओं पर निर्भर है;

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के

एक-एक दिन के

कलात्मक सौंदर्य के जादू से 

हम सब परिचित हैं।


विक्रम सँवत् के अनुशासन से

बंधे हैं हमारे आचार-विचार!

इसके मास,पक्ष और तिथियों का

अधूरा ज्ञान होने के बावजूद

नई और पुरानी पीढ़ी

विक्रम संवत् के साथ

दिल से जुड़ी हैं,

क्योंकि हमारे धार्मिक रीति-रिवाज, 

जन्म-विवाह-मृत्यु से संबंधित

सामाजिक व्यवहार,पर्व 

और त्योहार

इसी पर निर्भर हैं।


विक्रम सँवत् ने हमें

हिंदू पंचाँग ही नहीं दिया, 

अपितु वर्ष भर चलते रहने वाले

तीज-त्योहारों की सौगात भी दी;

इसी सौगात ने 

हमारी लोक-चेतना को

सशक्ततम बनाया है।


इस सँवत् ने सँवत्सर

और कालचक्र के विज्ञान को

जीवन के उल्लास से जोड़कर

उस उत्सव-धर्म की नींव रखी,

जो हमारे सँघर्ष भरे दिनों में भी

जीवन का उत्साह

बनाए रखने के लिए

वरदान सिद्ध हुई है।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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