होली के रङ्ग

 होली के रङ्ग


                  @मानव

होली मात्र एक पर्व न होकर 

जीवन के विविध रंगों का दर्पण है;

यह ऋतु परिवर्तन का उल्लास है;

हृदय के विकारों का दहन 

और आत्मीयता के रंग-रस से

अभिसिंचित अभिव्यक्ति है। 


जब प्रकृति नवपल्लवों से 

सुसज्जित होती है,

जब पुष्प अपनी सुगंध से 

वायुमण्डल को सुरभित करते हैं,

तब यह रँगोत्सव

मानो सजीव हो उठता है। 


होली का प्रमुख आकर्षण 

इसके रङ्ग हैं,

जो सामाजिक भेदभाव को 

तिरोहित कर देते हैं;

इस दिन सब एक होते हैं 

कोई ऊँच-नीच नहीं,

कोई पराया नहीं।


गुलाल के हल्के फाहों से 

आरंभ हुआ यह उत्सव

जब चटकीले रङ्गों में

परिणत होता है,

तब मानव मन की संकीर्णताएं भी

धुल जाती हैं;

हर मन प्रफुल्लित हो उठता है।


होली में केवल रङ्ग ही नहीं, 

अपितु आध्यात्मिक सँदेश भी है;

यह असत्य पर सत्य की 

विजय का प्रतीक है,

भक्ति की अडिंगता का साक्षी है।


प्रह्लाद की निर्भय भक्ति

और होलिका की चिता

हमें यह सिखाती है

कि कितनी भी बाधाएँ आएँ,

किंतु सत्य की लौ

अक्षुण्ण रहती है।


जीवन भी एक रङ्गमञ्च है

कभी उल्लास के रङ्ग बिखरते हैं

तो कभी विषाद की छाया घिरती है,

किंतु होली हमें सिखाती है

कि कोई भी रङ्ग स्थायी नहीं।


रङ्गों से भीगे चेहरे

कुछ समय बाद स्वच्छ हो जाते हैं,

वैसे ही जीवन के विषम क्षण भी

नष्ट हो जाते हैं।


जीवन में कठिनाइयाँ

अस्थायी हैं,

परंतु सद्गुणों का प्रकाश 

शाश्वत है;

मन यदि निद्वंद्व हो

तो प्रत्येक परिस्थिति में भी 

आनंद ही झरता है।


होली आत्मा की

स्वच्छंदता का भी उत्सव है; 

इस अवसर पर

मन की कटुता को 

होलिका-दहन में स्वाहा कर 

और रिश्तों में पुनः स्नेह के 

रङ्ग भरे जा सकते हैं।


जीवन तभी सार्थक है,

जब उसमें प्रेम

और समरसता के रङ्ग

अंतर् समाहित हों।


होली पर हमें भी

अंतर्मन के कोनों में

छिपे कलुष त्यागकर

जीवन को प्रेम और आनंद के

रङ्गों से सराबोर करने में जुटना है।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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