सत्य अन्वेषक महावीर
सत्य अन्वेषक महावीर
@मानव
महावीर होने का अर्थ है
स्वयं ही सत्य का सँधान करना
स्वयं को जानने का प्रयास करना
शरीर की आसक्ति को समाप्त कर
शुद्ध-बुद्ध आत्मा का
अनुभव करना।
महावीर होने का अर्थ है
जब तक संसार में हैं
तब तक यहाँ रहते हुए भी
निर्विकार रहना;
सँसार में रहकर
निर्लिप्त रहना।
तीर्थंकर महावीर भारत में जन्मे
ऐसे परम वीतरागी साधक थे,
जिन्होंने प्रत्येक आत्मा को
परमात्मा बनाने का पथ
प्रशस्त किया।
उन्होंने धर्म के नाम पर
व्याप्त अन्यान्य परंपराओं की
समीक्षा करके
धर्म की सनातन परंपरा को
विश्व के समक्ष रखा।
एक सर्प पर विजय पाने के कारण
उन्हें वीर नाम से पुकारा गया
और एक मदोन्मत्त हाथी को
वश में करने के कारण
उन्हें सन्मति व वर्धमान भी
कहा गया है।
वैशाली के एक राजकुमार ने
सत्य के संधान की राह पकड़ी,
उन्होंने तप किया
और कैवल्य ज्ञान होने
व सर्वज्ञ होने की दशा में जाना
कि ईश्वर कोई दूसरा व्यक्ति नहीं,
बल्कि मनुष्य स्वयं है।
उन्होंने आत्म-अनुसँधान के बल पर
यह उद्घोषणा की
कि ईश्वर सत्-चित्-आनंद
स्वरूप में रहता है
और हमारे माध्यम से ही
कार्य करता है।
महावीर होने का अर्थ है
स्वयं ही सत्य का सँधान करना,
स्वयं को जानने का प्रयास करना,
शरीर की आसक्ति को समाप्त कर
शुद्ध-बुद्ध आत्मा का
अनुभव करना।
करुणा,दया
और सेवा की भावना से
सभी जीवों के जीने के
अधिकारों की रक्षा करना,
अपने तुच्छ सुख के लिए
उनकी जान नहीं लेना।
कर्तृत्व बुद्धि न होना,
जगत के स्वतः परिणमन को
सहज स्वीकार करना;
प्रत्येक द्रव्य को स्वतंत्र मानना।
दूसरों को क्षमा कर देना
और अपने अपराधों की
क्षमा माँगना;
प्रत्येक जीव में
परमात्मा का दर्शन करना।
सापेक्ष दृष्टिकोण,
सापेक्ष कथन शैली
और समीचीन दृष्टि
जिसे सैद्धांतिक भाषा में
अनेकांत,
स्याद्वाद
और नयवाद कहा जाता है।
हमारे मन में
कामनाओं की कल्पनाएँ हैं;
असँयम,
अधिक सँग्रह की लालसा
और सँग्रह की सुरक्षा
वर्तमान की
सभी समस्या का मूल है;
हिंसा उसी का परिणाम है;
असत्य,चोरी
उसकी परिक्रमा कर रहे हैं;
कलह और युद्ध
हिंसा के शिखर हैं।
अधिकाधिक स्वामित्व के लिए ही
आज लड़ाई है;
विश्व शाँति स्थापना हेतु
महावीर की तरह हम भी
मन से,तन से शून्य बनें
ताकि जीवन की यथार्थता
नजर आ जाए।
काम,क्रोध,लोभ,मोह
और अहंकार जैसे
विकारों पर लगाम कसें
आवश्यकताओं की पूर्ति से
अधिक अर्जन और सँग्रह
दोनों ही अनर्थ को आमंत्रण देकर
हम पूरी उम्र कमाते हैं;
फिर भी पूरा नहीं पड़ता।
महावीर ने स्वयं अल्पेक्षा,
अल्पारंभ,अल्प-परिग्रह को
आचरण द्वारा स्थापित किया
और अनुकरणीय हुए;
पूजनीय हुए।
त्याग से जो प्राप्त होगा
वह स्थिर रहेगा।
यदि चाह सब कुछ पाने की है
तो सब कुछ त्यागना भी पड़ेगा।
महावीर जानते थे
कि हिंसा और हथियारों का प्रयोग
वे करते हैं,
जिन्हें भौतिक युद्ध लड़कर
किसी को पराजित करना हो।
महावीर का वैचारिक युद्ध तो
हिंसक विकृतियों,
गरीबी,
वर्ण-भेद,
छुआछूत,
अज्ञान के अंधेरे
और भोग के नशे जैसे
अवगुणों में डूबे समाज के
कल्याण हेतु था।
महावीर की राह से सीख लेकर
अपने परंपरागत वैशिष्ट्य को
अक्षुण्ण रखते हुए
वर्ग,जाति,धर्म
एवं विचारधाराओं में
विभाजित लोग
एक-दूसरे के समीप आएँ
और एक व्यापक मानवीय दृष्टि के
विकास का प्रयास करें।
भारतीय ज्ञान परंपरा के
विकास में
महावीर स्वामी के योगदान
अविस्मरणीय है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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