आत्मा-परमात्मा का एकत्व
श्री वल्लभाचार्य जयन्ती पर
आत्मा-परमात्मा का एकत्व
@मानव
प्रमुख हिंदू संत और दार्शनिक,
पुष्टिमार्ग के संस्थापक
श्री वल्लभाचार्य का जीवन
भगवान कृष्ण की दिव्य कृपा
और भक्ति पर केंद्रित था।
उन्होंने शुद्धाद्वैत के
सिद्धांत को विकसित किया,
जिसने आत्मा के साथ ब्रह्म की
एकता पर जोर दिया।
भक्तों और विद्वानों के लिए
आध्यात्मिक मार्गदर्शन का स्रोत
वल्लभाचार्य षोडश ग्रंथ,
सुबोधिनी जी
और मधुराष्टकम् जैसे
महत्वपूर्ण ग्रंथों के रचयिता को
जगद्गुरु जैसी उपाधियाँ
और कनकाभिषेक जैसे
सम्मान प्राप्त हैं।
शुद्धाद्वैत दर्शन मानता है
कि ब्रह्म (भगवान श्रीकृष्ण) ही
एकमात्र सत्य है
और यह सँसार भी
उसी ब्रह्म का अभिन्न रूप है;
माया से रहित,
शुद्ध और वास्तविक।
जीव भी ब्रह्म का अँश है
और उसके साथ उसका सँबंध
प्रेम और सेवा का होना चाहिए;
ब्रह्म शुद्ध है,
जीव शुद्ध है
और जगत शुद्ध है;
शुद्ध जीव और शुद्ध जगत का
शुद्ध ब्रह्म से अभिन्न संबंध है।
जगत का कारण रूप
ब्रह्म शुद्ध है,मायिक नहीं है;
ब्रह्म और जगत में
अद्वैत संबंध है।
वेद-वेदांत,गीता
और सभी भगवत-शास्त्र
ब्रह्मवाद का ही
प्रतिपादन करते हैं-
स्थापितो ब्रह्मवादो हि
सर्ववेदांतगोचर।
(पत्रावलंबनम् - 36)
श्री वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित
वैष्णव धर्म के
पुष्टि मार्ग संप्रदाय का दर्शन,
शुद्धाद्वैत,वास्तविकता का
अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है
जहाँ दुनिया
और व्यक्तिगत आत्मा को
ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में
देखा जाता है,
जिसमें कोई भ्रम
या अलगाव नहीं है।
ब्रह्म (परम वास्तविकता)
निर्माता और सृजन दोनों है
और कृष्ण की भक्ति
इस दिव्य एकता को
साकार करने का
मार्ग प्रदान करती है।
श्री वल्लभाचार्य अविकृत
परिणामवादी दार्शनिक हैं;
जिनका मत है कि ब्रह्म
जब जगत के रूप में
परिणत होता है,
तो भी उनमें किसी प्रकार का
विकार नहीं आता,
वह शुद्ध अविकृत ही रहता है।
जब ब्रह्म जगत का
रूप धारण कर लेता है,
तब भी वह
शुद्ध ब्रह्म ही रहता है,
उसमें कोई विकार नहीं आता।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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