मङ्गलदात्री तिथि
अक्षय तृतीया पर
मङ्गलदात्री तिथि
@मानव
वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया
"अक्षय तृतीया" तिथि
अपने नामानुरूप स्वयंसिद्ध
और हर प्रकार से मंगलदात्री है।
(धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु)
ज्योतिष की दृष्टि से
महूर्तादि के लिए यह
सर्वोत्तमा तिथि मानी गई है।
पौराणिक तथ्यों के अनुसार
सतयुग और त्रेतायुग का शुभारंभ
इसी दिन से हुआ है।
सृष्टि के अभिवर्धन
और अभिरक्षण की दृष्टि से
जगन्ननियन्ता श्रीहरि ने
धर्म की भार्या मूर्ति के गर्भ से
नर-नारायण के रूप में
चौथा अवतार इसी तिथि पर लिया।
इस अवतार में ऋषि के रूप में
मन-इंद्रिय का संयम करते हुए,
कठिन तपस्या कर भगवान ने
लोक को शिक्षा दी,
कि तपस्या के द्वारा मनुष्य
जीवन और प्रकृति के
रहस्यों को समझकर,
लोकहितकारी कार्यों का
उत्तम प्रकार से सँपादन
करता और करवाता है।
अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक
परमेश्वर श्रीहरि ने
अक्षय तृतीया तिथि को ही
हयग्रीव अवतार लेकर
वेदों की रक्षा की।
(श्रीमद्भागवतमहापुराण)
निरंकुश हो गई राजसत्ता को
सद्गति-मति देने के लिए
भगवान परशुराम के रूप में
पुनः श्री विष्णु ने अवतार लिया;
जन्मतः वे ब्राह्मण थे,
किंतु कर्म से उन्होंने
क्षत्रियोचित कार्य किए।
पथभ्रष्ट और निरंकुश हो गई
राजसत्ता पर अंकुश लगाकर
उसे लोकहित में
समुचित दिशा दी।
(स्कंद पुराण और भविष्य पुराण)
आदिगुरु शंकारचार्य महाभाग ने
अक्षय तृतीया के दिन ही
भगवान् के श्रीविग्रह को
विशालाक्षेत्र में
अलकनंदा नदी में स्थित
कुण्ड से बाहर निकालकर
श्रीबद्रीनाथजी के श्रीविग्रह में
प्रतिष्ठित किया;
श्रीबद्रीनाथ धाम के कपाट
दर्शनार्थ इसी दिन खोले जाते हैं।
कौरव-पाण्डव के मध्य हुए
धर्म-अधर्म के महायुद्ध
महाभारत पर विराम
अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ
तथा द्वापरयुग का समापन भी
इसी तिथि को ही माना गया है।
मथुरा-वृंदावन में
संगीत सम्राट और भगवद्भक्त
स्वामी हरिदास जी ने
अक्षय तृतीया के दिन
भगवान् बांके बिहारी जी के
प्राचीन काष्ठ विग्रह को प्राप्त किया
और उनकी प्रतिष्ठा की,
अतः श्रीबाँके बिहारी जी के
चरणकमलों का दर्शन
इसी दिन सुलभ होता है,
जो अन्य दिनों वस्त्र से ढका रहता है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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