शाश्वत श्रीराम

 शाश्वत श्रीराम


            @मानव

निर्बल के बल तो

राम ही होते हैं,

ऐसा करते हुए श्रीराम 

जाति-वर्ग नहीं,

वास्तविक भक्ति

और प्रेम को महत्व देते हैं। 


वह जहाँ सबके प्रति

उन्मुक्त भाव से उद्वार करते हैं,

वहीं स्वयं अपने से

निर्लिप्त बने रहते हैं।


राम की कथा

आम आदमी के जीवन में घुली है;

सुख हो या दुख,

हर्ष हो या विषाद,

हर तरह के अवसर पर 

श्रीराम को याद करते हुए 

लोक-जीवन का पहिया घूमता है।


रामनवमी वह माँगलिक तिथि है

जिसने शाश्वत सत्य

सनातन परमात्मा को

मनुष्य रूप में अवतीर्ण कर 

धरती को जीवन का वरदान दे दिया।


श्रीराम मानवता के सर्जक 

और पोषक हैं,

विचार,वाणी

एवं कर्म के मानदण्ड होने से 

उत्कृष्ट जीवन की पद्धति हैं। 


वह आदर्श से पहले यथार्थ नहीं,

मंदस्मित के साथ

जीवन का मधुर सँवाद हैं;

जहाँ विवाद का कोई स्थान नहीं;

इसीलिए वैरी भी उनके प्रशंसक हैं।


यदि कण्टकाकीर्ण पथ के 

अनुगामी होने से

जीवन की मूक वेदना है,

तो दीन-दुखियों के

सच्चे सुहृद होने से

मुखर सँवेदना भी।


यद्यपि परमात्मा होने से 

वे सबके आराध्य हैं,

किंतु आचारहीन के लिए 

दुराराध्य भी।


वह ऐसी आधारभूमि हैं, 

जिसकी सुदृढ़ बुनियाद पर 

जीवन का मंगलमय प्रासाद 

खड़ा होता है।


राम समाज निर्माण की

ऐसी पाठशाला हैं

जिसमें सद्धर्म का

हर पाठ समाहित है;

तभी तो श्रीराम

"अखिल लोकदायक विश्रामा"

इस सार्वभौमिक स्वीकार्यता से

प्रतिष्ठापित हैं।


धर्म के व्यापक स्वरूप को

श्रीराम के चरित्र ने

पूर्णता प्रदान की,

उनके प्रत्येक आचरण की मर्यादा

धर्म का लक्षण बन गई है; 

तभी तो वह

धर्म के साक्षात विग्रह हैं। 


श्रीराम राक्षसों के वध के लिए नहीं,

अपितु अंतःकरण से

आसुरी प्रवृत्तियों को समाप्त कर

सत्प्रवृत्तियों की स्थापनार्थ

अवतरित हुए।


वे जग के समक्ष

दीनवत्सलता, 

समरसता

और बंधुता का उदाहरण हैं।


उन्हें समाज में हेय

निषाद,केवट व भीलनी सम मानव  

जटायु जैसे अधम पक्षी

और विभीषण जैसे असुर भी

अतिशय प्रिय हैं।


श्रीराम का मानुष रूप में 

लोकावतरण

एक रोमाँचकारी अवसर होता है,

जब हम उनको अपने जीवन में

आसपास पाने की लालसा लिए

रामनवमी मनाते हैं।


हर किसी को अनुभव में 

आने वाली पीड़ा और सुख, 

निराशा और आशा,

लोभ और मोह,

भय और साहस, 

हास-परिहास

तथा प्रेम और घृणा जैसी 

भावनाओं के आरोह-अवरोह के 

अनेकानेक क्षण

एक के बाद एक लगातार 

श्रीराम के जीवन में आते ही रहते हैं;

यही मानव स्वभाव है

और इसे स्वीकार करते हुए 

आगे बढ़ना है।


राम-राज्य का आशय 

दैहिक,दैविक और भौतिक 

तीनों तरह के तापों से

मानव समाज की मुक्ति है। 


इसके लिए मन,बुद्धि और कर्म

तीनों को पवित्र करना होगा;

तभी विचार में बल आ सकेगा,

मन स्फूर्ति का संचार होगा 

और हमारे कर्म फलवान हो सकेंगे।


इसी वृत्ति से सन्नद्ध होने पर ही

देश के उत्थान के कार्य में 

सफलता मिल सकेगी,

धरती की अविरल

जीवन धारा के साथ

श्रीराम सदैव अभिवंद्य रहेंगे।


✒️मनोज श्रीवास्तव



Comments

Popular posts from this blog

भगवान के सन्देशवाहक

वट वृक्ष की शरण

मेवाड़ का सूर्य