माँ!

 माँ!


           @मानव

माँ एक ऐसा शब्द है

जिसमें पूरा ब्रह्माण्ड समा जाए;

जब हम माँ बोलने के लिए

मुँह खोलते हैं

तो शब्द के उच्चारण के साथ ही

पूरा मुँह भर जाता है।


माँ ममता की मूरत होती है;

पूरी दुनिया के सभी पँथ ने 

माँ के रिश्ते को पवित्रतम माना है;

अपने बच्चों के प्रति

माँ का प्यार,दुलार,समर्पण 

और त्याग अनमोल होता है।


माँ!

ये एक अक्षर वाला सँबोधन 

पूरे ब्रह्माण्ड में सबसे ताकतवर

शब्द माना जाता है;

माँ भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है;

उसके जितना त्याग

और प्यार कोई नहीं कर सकता है।


माँ सिर्फ शब्द नहीं

बल्कि एक भावना है;

माँ वो हैं

जो न सिर्फ हमें जन्म देती है 

बल्कि हमें जीना भी सिखाती है।


माँ को सँस्कृत में मातरः कहते है,

माँ ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है 

जिसके माध्यम से परमेश्वर 

अपने अंश द्वारा अपनी शक्ति का

सँचार और विस्तार करता है।


पुराणों में माँ का अर्थ लक्ष्मी है;

जिस प्रकार माँ लक्ष्मी

सृष्टि का पालन करती हैं 

उसी प्रकार माँ भी

शिशु का पालन करती है।


इस सृष्टि का आरंभ

मनु और शतरूपा के 

समागम से हुआ;

मनु के नाम पर ही

उनकी सँतान को मनुज

या मानव कहा गया;

मनु की संतान को

जिसने जन्म दिया

उसे माँ कहा गया।


दुनिया में माँ की तुलना 

भगवान से की जाती है;

भारत में पवित्र गङ्गा को

माँ का दर्जा दिया जाता है 

जो इस बात का सँकेत है 

कि माँ स्वयं में एक उपाधि है।


माँ होने का अर्थ है उत्तरदायित्व

और निस्वार्थता से

पूरी तरह से अभिभूत होना; 

मातृत्व का मतलब है

रातों की नींद हराम करना। 


माँ विश्व की जननी है

उसके बिना संसार की 

कल्पना भी नहीं है;

माँ ही हमारी जन्मदाता है

और वही हमारी पहली गुरु है।


माँ नौ माह तक अपने बच्चे को

कोख में रखकर जन्म देती है;

उसका लालन-पालन करती है;

कुछ भी हो जाए

एक माँ का अपने बच्चों के प्रति

स्नेह कभी कम नहीं होता है।


माँ खुद से भी ज्यादा

अपने बच्चों के सुख सुविधा हेतु

चिंतित रहती है;

अपनी संतान की रक्षा के लिए

बड़ी से बड़ी विपत्तियों का 

सामना करने का साहस रखती है।


हम धरती को भी 

धरती माता कहते हैं;

जो अपने ऊपर हम सब का 

भार उठाती है।


हमारे देश में गाय को भी 

गौमाता कह कर पुकारते हैं 

जो हमें अपना दूध पिला कर

बड़ा करती है।


माँ हमारे जीवन की

सबसे प्रमुख हस्ती है

जो कुछ पाने की उम्मीद किए बिना

सिर्फ देती ही रहती है। 


माता और मातृभूमि का स्थान 

स्वर्ग से भी ऊपर होता है

जननी जन्मभूमिश्च

स्वर्गदपि गरीयसी

  (महर्षि वाल्मीकि)

और उनके चरणों में ही 

बैकुण्ठ धाम है।


नास्ति मातृसमा छाया, 

नास्ति मातृसमा गतिः।

नास्ति मातृसमं त्राण,

नास्ति मातृसमा प्रिया ।।


माता के समान

कोई छाया नहीं है,

और न ही उनके समान

कोई सहारा है;

न तो दुनिया में माँ के समान 

कोई रक्षक है

और उनके समान कोई

प्रिय वस्तु भी नहीं है। 


माता इस भूमि से

कहीं अधिक भारी होती हैं;

  (यक्ष युधिष्ठर सँवाद)

अर्थात् सँसार में माता का स्थान

सबसे अधिक गौरवपूर्ण है। 


"माँ"शब्द का अर्थ समझना 

और समझाना

दोनों ही लगभग नामुमकिन है;

क्योंकि माँ के प्यार को

माँ के बलिदान को

शब्दों में नहीं समझाया जा सकता

इसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है।


माँ के दिल में जितना प्यार 

अपने बच्चों के लिए होता है,

सभी बच्चे कोशिश भी करें 

तो उसका कुछ अंश भी 

अदा नहीं कर सकते।


माँ शब्द का अर्थ है

निःस्वार्थ प्यार और बलिदान;

माँ वो होती है

जो खुद भूखी सो जाए

पर अपने बच्चो को

भूखा रहने नहीं देती।


उसे खुद कितनी भी तकलीफ हो

वो जताती नहीं

और सिर्फ अपने बच्चों की ही

सलामती की दुआ करती है। 

माँ की ममता

समुद्र से भी गहरी है।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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